गुरुवार, 7 जून 2012

आगरा/1996-97 (भाग-1 )

 ......जारी..........

चूंकि उस समय तक टिकट आगरा से लौटने का  बुक करने की व्यवस्था नहीं थी अतः पटना से बाबू जी साहब ने 'मगध एक्स्प्रेस' से टिकट बुक करा रखा था। नियत समय साँय सात बजे हेतु स्टेशन पहुंचे तो पता चला कि गाड़ी  तीन घंटे लेट छूटेगी। पहुंचाने गए ई ओ साहब उनके इंजीनियर भाई और उनकी आरा वाली चाची के बेटों ने मिल कर घर लौट चलने का तय किया। यों तो मेरी आदत लेटने-आराम करने की नहीं है किन्तु एक-हफ्ता चिकना-तला-भुना खाना जो मुझे नापसंद है खाते-खाते तबीयत गड़बड़ा गई थी अतः लेट गया था। उसी दौरान ई ओ सहाब के रेस्टोरेन्ट वाले साढ़ू साहब का फोन आया होगा। उनसे मेरा परिचय कभी नहीं कराया गया था फोन पर मुझे उनसे बात करने को कहा गया। एक अंनजान व्यक्ति से(मुझसे) जिस प्रकार उन्होने कहा वह बगैर ई ओ साहब या उनकी श्रीमती जी के सहयोग व समर्थन के संभव न था। बाद मे इंजीनियर साहब ने तो स्पष्ट रूप से अपने भाई और भाभी को ही दोषी ठहराया था। लेकिन परिस्थितिका  कूटनीतिक तकाजा था कि शांतिपूर्ण और निर्विघ्न यात्रा सम्पन्न करने हेतु  उस समय मौन रहा जाये और वही मैंने किया। मैंने  अपनी माँ से सुना हुआ था कि एक चुप सौ को हरावे। इस कहावत पर अमल करने का यह समय था जिस कारण ई ओ साहब और उनकी श्रीमती जी के मंसूबे ध्वस्त हो गए। लेकिन आगरा पहुँच कर मैंने पत्र मे बाबूजी साहब को उस फोन काल के बारे मे सूचित किया जिस पर उन्होने जवाब दिया कि वह अपने स्तर से जांच कर मुझे सूचित करेंगे जो कि मृत्यु पर्यंत उन्होने सूचित नहीं किया क्योंकि वह अपने ज्येष्ठ पुत्र और पुत्र-वधू की कारगुजारी से अच्छी तरह वाकिफ थे अतः चुप्पी साधे  रखना उनकी अपनी मजबूरी भी थी।

इंजीनियर साहब  बालाघाट से पटना जाते हुये अक्सर आगरा एक-दो रोज़ रुक जाते थे। अगस्त मे भी ऐसे ही अचानक आए थे। हमारे यहाँ से जाने के बाद पटना मे उनकी एंगेजमेंट हुई और न तो यहाँ पूनम को बता कर गए थे न वहाँ से सूचित किया बल्कि बात ज़ाहिर करने पर अपनी भाभी को झाड ज़रूर दिया। पूनम के माता-पिता अपने पुत्रों के आगे बेबस थे अतः उन लोगों ने भी अपनी पूत्री  को सूचित करने का साहस नहीं किया था। ई ओ साहब की श्रीमती जी ने नन्द को सूचित किया तो आदरणीय देवर साहब से झाड खानी पड़ी। उनकी शादी की तारीख यशवन्त के जन्मदिन के दिन की रखी गई थी जिसका श्रेय इंजीनियर साहब अपने ऊपर लेते हैं और बाबू जी साहब ने अपना निर्णय बताया था। बहरहाल मुझे मजबूरन यशवन्त के जन्मदिन पर अपने घर से बाहर रहना पड़ा। इंजीनियर साहब की शादी के 12 दिन बाद ई ओ साहब की प्रिया चाची आरा वाली की बेटी की भी शादी थी। शादी वाले रोज  सुबह बाबूजी साहब ई ओ साहब से इंजीनियर साहब की शादी की तैयारी के सिलसिले मे ज़रूरी सलाह कर रहे थे उन्होने मुझे भी वहाँ बुला कर बैठा लिया था शायद यही ई ओ साहब को अच्छा नहीं लगा और जैसे ही उनके सबसे छोटे चाचा ने आँख का इशारा किया ई ओ साहब अपने पिताजी से कुछ भी बताए बगैर चुप-चाप उठ कर उनके साथ घर से बाहर निकल गए। जब काफी देर हो गई तो बाबू जी साहब ने ई ओ साहब को खोजना चाहा तो मैंने बता दिया कि वह तो राजवंशी नगर वाले चाचा जी के साथ कहीं चले गए हैं। उनको यह बुरा लगा कि पिता को ठुकरा कर चाचा के साथ अपनी प्रिया चाची की बेटी की सुसराल ई ओ साहब चले गए और वह भी उनको सूचित किए बगैर। दिन मे जब वह दिखाई दिये तो सब के सामने बाबू जी साहब ने ई ओ साहब को जम कर लताड़ते हुये कहा-"You are not reliable to me, You are not faith full to me." मन मे अपनी गलती महसूस करते हुये ई ओ साहब चुप-चाप सुनते रहे उन्होने ई ओ साहब की चाची को भी जम कर लताड़ा उनकी भी बोलती न निकल पाई।

इंजीनियर साहब रिक्शा द्वारा खुद खाजा-गाजा खरीदने जा रहे थे साथ मे मुझे भी बैठा ले गए। रास्ते मे उन्होने ई ओ साहब के साढू का ज़िक्र करके अपने भाई-भाभी के विरुद्ध मेरी मदद मांगी। मैंने उन्हें स्पष्ट कर दिया अपने शिकवे से हम अपने आप निपटेंगे अपने भाई-भाभी से आप अपने आप निपटिए मैं हस्तक्षेप नहीं करूंगा। मैंने उन्हें सलाह भी दी की वह किसी और से अपने भाई -भाभी के विरुद्ध मदद न मांगे क्योंकि घर की बात बाहर जाती है जो नहीं जानी चाहिए। शायद इंजीनियर साहब को मन मे बुरा लगा कि मैंने उनका साथ नहीं दिया । उस समय वह चुप रहे किन्तु प्लेट फार्म नंबर चार पर हम लोगों को मगध एक्स्प्रेस पर छोडने आते समय उन्होने पूनम को बुरी तरह झाड़ा और दूसरे प्लेटफार्म पर रांची वाले प्रोफेसर चाचा-चाची के पास चले गए। स्टेशन पर मैंने पूनम को समझा दिया कि छोटे भाई को यहाँ नजर अंदाज़ कर दो।

उनकी शादी के बाद जिस दिन वह अपनी पत्नी को विदा करके घर ला रहे थे प्रोफेसर साहब ने भी पूनम को नाहक ही कस कर झाड़ा था कि कोई सफाई नहीं की दुल्हन का पलंग नहीं सजाया। प्रोफेसर साहब की तहबीज मे कैसे यह बात शामिल हुई कि बड़ी बहन छोटे भाई की पत्नी का पलंग सजाये मेरी समझ से परे थी जबकि वहाँ अनेकों उनसे  छोटी  अविवाहित बहने मौजूद थीं। पूनम का कहना था कि उन्होने चार साल रख कर पढ़ाया-लिखाया है इसका एहसान है। मैं इस बात से भी सहमत नहीं हूँ। यदि कोई एहसान था तो पूनम के माता-पिता के ऊपर था पूनम पर नहीं। फिर किस हेसियत से विवाहित भतीजी को प्रोफेसर साहब ने उसके पति के समक्ष फटकारा?यह कौन सी काबिलियत है?वह तो बाबू जी साहब पर भी इसलिए बिफर गए थे कि उन्होने छोटे भाई को लेक्चरार कह  दिया था। प्रोफेसर साहब ने अपने सबसे बड़े भाई को भनना कर कहा था-"I am not lecturer ,I am professor." कहा जाता है कि प्रोफेसर साहब का अहंकार और पैसे वाला होने का गरूर बात-बात मे झलकता है। एक और गरूर उन्हें यह है कि उनका बीच का बेटा और पुत्र-वधू दोनों IAS हैं। वैसे इंजीनियर साहब की दाढ़ी-मूंछ प्रोफेसर साहब ने सँवारी  थी तब नाई की ड्यूटी बखूबी अदा की थी।

एक और अपने भतीजे की शादी मे आने पर प्रोफेसर साहब ई ओ साहब की बेटियों को संस्कृत के खिलाफ भड़का रहे थे,मुझसे समर्थन कराना चाहते थे कि इंगलिश के बगैर आदमी भूखा मरता है। मुझे उनकी एक भी बात धेला भर भी नही सुहाती है मैंने कह दिया-'पेट तो एक भिखारी भी बगैर कुछ पढे भर लेता है'। एक बार उसके बाद और मुझसे पहले तो अपने रांची वाले मकान के संबंध मे 'वास्तु' की जानकारी पूछी और डायरी मे नोट कर लिया फिर कहते हैं हमे वास्तु पर विश्वास नही। तब क्यों पूछा और क्यों नोट किया?प्रोफेसर साहब ने अपने छोटे बेटे की शादी का पत्र भेजा और लिख दिया कि आने की पूर्व सूचना देना। इससे पूर्व उनके बड़े बेटा हमारे आगरा के घर मे बिना पूर्व सूचना के मय सपरिवार आ चुके थे फिर उसी बेटा के साढू अपने और अपने मित्र के परिवार सहित भी बिना पूर्व सूचना के आ चुके थे। यही नहीं वह खुद भी उस शादी और पत्र लिखने के बाद हमारे घर अचानक बिना पूर्व सूचना के पहुंचे थे।उनके IAS बेटा और पुत्र-वधू भी बिना पूर्व सूचना के ही हमारे घर आए थे।  फोन पर मुझसे आगरा का मकान बेचने और लखनऊ मे खरीदने का दाम पूछना उनकी कौन सी हेसियत हुई? न बताने पर  टोह लेने हेतु अपने अहमदाबाद (मोदी भक्त)निवासी भतीजा को लखनऊ हमारे घर भेजने का असफल प्रयास किया। मेरे मौजूदगी मे ई ओ साहब से भोजपुरी मे इस लिए बात करने लगते हैं कि उन्हें यह जतलाना रहता है कि वह अपने क्षेत्र  और जाति से भिन्न लोगों को दोयम दर्जे का मानते हैं।


 हमारी बहन जी डॉ शोभा(जो संस्कृत मे पी एच डी हैं) को प्रोफेसर साहब की बातें भी पसंद हैं और ई ओ साहब की आरा वाली चाची की बेटी भी जो उनकी छोटी बेटी के शहर पूना मे ही रहती है। पूना आजकल मेरे तथा मेरे पुत्र यशवन्त के विरुद्ध षडयंत्रों का अड्डा बना हुआ है। वहाँ प्रवास कर रहे ब्लेक मेलर्स ब्लागर ,ब्लाग जगत मे हमारे विरुद्ध हम लोगों से पहले लाभ उठा लेने के बाद अब षड्यंत्र बुन रहे हैं।

क्रमशः..... 

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1 टिप्पणी:

  1. I read your post interesting and informative. I am doing research on bloggers who use effectively blog for disseminate information.My Thesis titled as "Study on Blogging Pattern Of Selected Bloggers(Indians)".I glad if u wish to participate in my research.Please contact me through mail. Thank you.

    http://priyarajan-naga.blogspot.in/2012/06/study-on-blogging-pattern-of-selected.html

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