मंगलवार, 12 नवंबर 2013

बहुत मुश्किल है कुछ यादों का भुलाया जाना (भाग-4)

 पहले कुछ चाचाजी साहब की लखनऊ यात्रा के संबंध में,फिर पलटते हैं अतीत के कुछ पन्नों को :

02 नवंबर 2013 
https://www.facebook.com/groups/331682593586639/permalink/536345669786996/ 
कल धन्वन्तरी जयंती पर एक विस्तृत लेख 'सर्वे भवन्तु...'ब्लाग में दिया था समस्त मानवता के स्वस्थ जीवन व्यतीत करने हेतु। इस स्वास्थ्य संबंधी ब्लाग एवं 'साम्यवाद...'ब्लाग निकालने हेतु मुझे मेरी पत्नी 'पूनम' द्वारा प्रेरित किया गया है। कल ही पटना से चल कर पूनम के एक चाचा लखनऊ 'संजय गांधी ...'संस्थान में इलाज के वास्ते आए हैं। घरेलू उपाय न आज़माने एवं घर के वास्तु दोषों का निवारण न करवाने (जिनके बारे में उनको मैंने नौ वर्ष पूर्व बताया था)के कारण ही उनको गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है। लोग एलोपेथी पर अंध भक्ति रखने के कारण जो कष्ट उठाते हैं उससे मुझे वेदना होती है इसी कारण स्वास्थ्य संबंधी ब्लाग शुरू किया था क्योंकि 'चिकित्सा समाज सेवा है-व्यवसाय नहीं'। हम इन दीपावली पर्वों पर सभी जनों के शारीरिक एवं मानसिक खुशहाली की कामना करते हैं।
08 नवंबर 2013 
 https://www.facebook.com/groups/331682593586639/permalink/539622606125969/
आजकल मेरी श्रीमतीजी के एक चाचा SPGI में किडनी की खराबी की वजह से ही इलाज कराने पटना से आए हुये हैं। उनकी तकलीफ देख कर वेदना हुई परंतु वे लोग एलोपेथी पर अंध-भक्ति के कारण इन प्राकृतिक उपचारों पर ध्यान नहीं देते हैं और न ही वास्तु दोषों (जो नौ वर्ष पूर्व अवगत करा दिये थे)का ही निवारण करा सके हैं। वे लोग चुटियाधारी,रामनामी गमछा ओढ़े पोंगा-पंडितों के चक्र में रहे हैं जिस कारण आज इतनी तकलीफ उठा रहे हैं। यदि और लोग सबक सीख कर इस पोस्ट का लाभ उठा सकें तो उत्तम है।
http://vijaimathur05.blogspot.in/2013/11/kidney-cleanser-foods.html
श्रीमतीजी को जब पटना से चाचाजी साहब के लखनऊ आने के बारे में सूचना न प्राप्त हो सकी तब उन्होने सीधे  चाची जी से फोन वार्ता द्वारा उनका हाल पूछा और हम छह नवंबर को उनसे एक घंटे इंतजार के बाद  भेंट कर सके क्योंकि वह आँखों के OT में थे जब हम SGPGI पहुंचे थे । नौ तारीख को जब हम दोबारा मिलने गए तब डॉ द्वारा उनको डिस्चार्ज करने की बात कही गई क्योंकि वह पहले से बेहतर हो गए । अतः अगले दिन10 तारीख की शाम को हम फिर मिलने गए तब उनके गोरखपुर जाकर आगे का इलाज कराने की जानकारी मिली।  चूंकि हम लोग उनके लिए खाना-नाश्ता ले जाते थे अतःडायलेसिस से आते ही  चाचा जी ने शायद उसी को  मद्दे नज़र रखते हुये पूनम व मुझे आशीर्वाद स्वरूप कुछ रुपए भेंट किए या फिर पूनम ने उनके पुत्र को छोटे भाई के रूप में जो दिया था उसमें से आधा लौटा दिया। 
चाचा जी ने अपने मकान के वास्तु-दोष का निराकरण न कराने का कारण यह बताया कि उनको किसी पंडित ने समझा दिया था कि 'नैऋत्य'कोण का बढ़ा होना उनके लिए शुभ है। मैं चूंकि ब्राह्मण या पंडित जाति का नहीं हूँ इसलिए चाचा जी ने मेरे सुझाव  को न मान कर ब्राह्मण पंडित का आसरा लिया और उसने उनको गुमराह करके कष्टों में पहुंचा दिया। इस दोष का प्रभाव उनके दोनों पुत्रों  व पौत्र पर भी पड़ा है। ब्लाग्स में भी पटना की मूल निवासी एवं पूना प्रवासी श्रीवास्तव ब्रादरी की एक ब्लागर जिसने खुद चार-चार जन्म पत्रियों का विश्लेषण मुझसे निशुल्क प्राप्त किया था मेरे ज्योतिष ज्ञान पर IBN7 में कार्यरत अपने चमचा श्रीवास्तव ब्लागर द्वारा प्रहार करवाया था। इस पूना प्रवासी ब्लागर ने पूना स्थित मेरी छोटी भांजी और चाचाजी की एक और भतीजी के साथ गठबंधन करके हमारे दोनों तरफ के रिशतेदारों के बीच भी हमारे विरुद्ध व्यापक दुष्प्रचार अभियान चलाया है जिस कारण ही गत वर्ष पूनम को बुलाने जाने पर हम लोगों ने गोलघर पर समय व्यतीत कर दिया लेकिन उनके भाई जान के घर इसलिए  नहीं गए थे,क्योंकि वह पूना स्थित अपनी चचेरी बहन(जिसके छली भाई को मैंने लखनऊ अपने घर नहीं आने दिया था तब उनका कथन था कि वह खुद  आयें या उनका वह चचेरा भाई आए एक ही बात है) और उसकी माँ को निर्दोष मानते हैं । इन सब बातों का विस्तृत वर्णन चाचाजी और चाची जी को बता दिया है। अभी तो वह इलाज में व्यस्त हैं लेकिन बाद में गौर करेंगे तो उनको ही लाभ होगा। 
अगस्त 2009 में जब हम आगरा से  पटना जाने पर इन्ही चाचाजी से मिलने गए थे क्योंकि तब वह दिल्ली हार्ट -सर्जरी के लिए जाने वाले थे।तब भी उनकी वह धूर्त भाभी (जिनकी पुत्री पूना में है) समस्त वार्ता के दौरान इस तथ्य के बावजूद उपस्थित रहीं कि मैं उनको 'नमस्ते' -अभिवादन तक नहीं करता हूँ। उनकी धूर्तता के परिणाम स्वरूप मुझे लखनऊ का मकान लेने में ज्ञात जानकारी के अनुसार एक लाख रुपयों की ठगी का शिकार होना पड़ा था। हालांकि उन धूर्त को खुद कोई लाभ तो न हुआ परंतु मुझको नुकसान पहुंचाने से उनको परम संतोष की प्राप्ति हुई । अतः मैं उन धूर्त समेत उनकी समस्त संतानों को घृणास्पद मानता हूँ और पूनम के भाई जान को मेरा यह दृष्टिकोण नापसंद है। मैं उनकी पसंदगी की खातिर और अधिक नुकसान झेलने को बिलकुल तैयार नहीं हूँ। उन्होने अपने पूरे परिवार को मेरे प्रति नफरत से भर दिया है जिसका मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पसकता और मैं उनकी धूर्त चाची (और बच्चों समेत)को रिश्तेदार के रूप में कुबूल नहीं कर सकता। 
दिसंबर में पटना में एक समारोह में शामिल होने का निमंत्रण भी है और खुद पूनम का कुछ काम भी अटका पड़ा है फिर भी इसलिए जाना संभव नहीं है कि वह कार्यालय उनके भाई जान के घर के बगल में स्थित है। हालांकि लखनऊ होकर गई  चाची जी ने तो अपने घर भी  रुकने का प्रस्ताव दिया है किन्तु कार्य हेतु तो पूनम को अपने भाई जान के पड़ौमें ही जाना होगा और फिर उनके घर न जाएँ यह उनके लिए संभव न होगा। पूना प्रवासी ब्लागर,हमारी भांजी और पूनम की एक चचेरी बहन की तिकड़ी छल द्वारा आज हमें जो नुकसान पहुंचा लें इसके खामियाजे से वे लोग भी बच न सकेंगे। यदि लखनऊ होकर लौटे चाचाजी,चाची जी इतना नुकसान-परेशानी उठाने के बाद मेरी बात समझ सके होंगे तो आगे से उनको भी बचाव करके लाभ व स्वस्थ्य लाभ दोनों मिल सकेगा। हम उनकी कुशलता के लिए मंगलकामना करते हैं। 

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गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

बाबूजी का स्मृति चित्रण ---विजय राजबली माथुर

बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

रावण वध एक पूर्वनिर्धारित योजना.- (पुनर्प्रकाशन)



(यों तो हमारे पिताजी का जन्मदिन 04 सितंबर 1920  माना गया है और उसी के आधार पर 30 सितंबर 1978 को उनका रिटायरमेंट भी हुआ था। किन्तु पुराने कागजों मे उनकी एक जन्मपत्री मिली जिसके अनुसार उनका जन्म 24 अक्तूबर 1919  को हुआ था। अतः इस लेख का पुनर्प्रकाशन मैं अपने पिताजी स्व.ताज राज बली माथुर साहब को उनके जन्मदिन पर श्रद्धा पूर्वक समर्पित करता हूँ। )



गत वर्ष 'क्रांतिस्वर' ब्लाग में उपरोक्त उल्लेख के साथ बाबूजी के जन्मदिन पर पहली बार स्मरण किया था। आज यदि वह होते तो आज ही दिवंगत हुये मन्ना डे जी के समान 94 वर्ष की आयु को प्राप्त हुये होते परंतु उनको इस संसार से कूच किए हुये लगभग साढ़े 18 वर्ष व्यतीत हो चुके हैं किन्तु उनकी स्मृति तो जीवन पर्यंत अक्षुण  रहेगी।

बाबूजी के आज के जन्मदिन की पूर्व वेला में कल दिनांक 23 अक्तूबर 2013 को दो ऐसे फेसबुक मित्रों से भेंट का सौभाग्य प्राप्त हुआ जिन्होने अपने-अपने तरीके से मुझे प्रोत्साहित व सम्मानित किया। हालांकि फेसबुक पर ही फेसबुक मित्रों के संबंध में अनेकानेक लोग विपरीत टिप्पणियाँ करते हैं परंतु मुझको अभी तक मिल चुके तमाम फेसबुक मित्रों में से फेसबुक मित्र डॉ डंडा लखनवी जी के बाद इन दोनों में भी  'आत्मीयता' मिली।  

दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में प्रतिष्ठित एवं सम्मानित हैं। दोनों के द्वारा मेरा मान किए जाने का कारण मेरा लेखन है। एक तो सुप्रसिद्ध महान लेखक हैं जिन्होने अपनी प्रकाशित दो पुस्तकें मुझे ससम्मान/सस्नेह भेंट कीं; दूसरे ने मेरे एक ब्लाग को भविष्य हेतु आज की सामयिक आवश्यकता बताया। मैं उन दोनों का हृदय से ऋणी हूँ। 

लेकिन आज मेरे लेखन को जो मान्यता या सराहना मिल रही है उसका सम्पूर्ण श्रेय श्रद्धेय बाबूजी का है। जब मैं 7-9 वर्ष की आयु में डी पी निगम गर्ल्स जूनियर हाईस्कूल,लखनऊ में कक्षा 3-4 का छात्र था तब हमारे बाबूजी मेरे लिए प्रत्येक रविवार को 'स्वतंत्र भारत' की एक प्रति ले देते थे जिस पर हमारे फुफेरे भाइयों (जिनमें से एक पूना में सेटिल हैं तो दूसरे डेढ़ किलो मीटर की दूरी पर रहते व मुझे तुच्छ समझते हैं) को एतराज होता था। वे भुआ-फूफाजी से शिकायत करते थे कि मामाजी बेकार विजय के लिए इतना खर्चा करते हैं वह क्या समझता होगा?मुझे खुद अब कुछ याद नहीं है कि उस समय वाकई मैं अखबार पढ़ कर क्या समझता था?परंतु हमारे बाबूजी कुछ तो समझते होंगे जो मेरे लिए खुद-ब-खुद पहल कर के अखबार लेने लगे थे और उस पर माँ को भी कभी कोई आपत्ति नहीं हुई थी। 1961-62  में बरेली में कक्षा 4-5 में मुझे बाबूजी अपने दफ्तर की स्टाफ क्लब से 'धर्मयुग','साप्ताहिक हिंदुस्तान',कुछ उपन्यास (जिनमें स्वाधीनता आंदोलन के कुछ क्रांतिकारी आंदोलन पर भी आधारित थे) भी पढ़ने को ला देते थे। उस पर भी माँ की तरफ से न  कोई आपत्ति थी न  ही पढ़ने से माँ ने रोका। 

1969-71 के दौरान इंटर और बी ए की पढ़ाई के समय बाबू जी अपने आफिस की लाइब्रेरी से दैनिक 'नवभारत टाईम्स' और 'हिंदुस्तान' के विगत दिवस के अंक ला देते थे जिनको अगले दिन सुबह वापिस ले जाना होता था। इनके साथ-साथ 'धर्मयुग','हिंदुस्तान','सरिता','सारिका' और कुछ उपन्यास भी लाते थे जिनको 7 दिन में पढ़ कर वापिस करना होता था। मेरठ कालेज,मेरठ में बीच के खाली पीरियड्स में मैं लाइब्रेरी के एक अलग-थलग कोने में बैठ कर जिन पुस्तकों को पढ़ता था उनमें कुछ के नाम आज भी याद हैं-काका कालेकर साहब की गांधी जी पर पुस्तक,'हिन्दी के साहित्य सेवी' आदि। स्वामी दयानन्द 'सरस्वती' के प्रवचनों का संकलन-'धर्म और विज्ञान' पुस्तक काफी मोटी  और भारी थी कई माह में उसका अध्यन पूर्ण हो पाया था। लाइब्रेरियन साहब ने अपनी कुर्सी के नीचे उस पुस्तक को रख छोड़ा था क्योंकि उनको मालूम था कि पूरा पढे बगैर मैं रहूँगा नहीं तो रोज़-रोज़ आलमारी में रखने का झंझट वह क्यों करें?'मेरठ कालेज पत्रिका' में मेरा पहला लेख-'रावण -वध एक पूर्व निर्धारित योजना' 1970-71 के अंक में छ्पा था जिसका संशोधित और विस्तारित रूप आगरा में 'सप्तदिवा साप्ताहिक' में दो किश्तों में  1982 में प्रकाशित हुआ था जिसे 'क्रांतिस्वर' ब्लाग में 2010 में चार किश्तों मे दिया गया था। गत वर्ष 2012 में आज ही के दिन बाबूजी के जन्मदिन पर उसे पुनर्प्रकाशित किया था। इस लेख पर उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के डायरेक्टर माननीय डॉ सुधाकर अदीब साहब ने जो टिप्पणी दी है वह मेरे लिए 'अमूल्य निधि' है। 

आज का मेरा लेखन और उसकी विद्वजनों द्वारा मान्यता हमारे बाबूजी के ही प्रयासों व आशीर्वाद का फल है। प्रस्तुत वर्णन हमारे पूरे परिवार की ओर से  बाबूजी को श्रद्धा सुमन/नमन  के रूप में अर्पित है।         

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बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

लखनऊ पुनरागमन के चार वर्ष ---विजय राजबली माथुर

 लखनऊ से लखनऊ :
जन्म से लेकर 1961 में बाबूजी के बरेली तबादले तक लखनऊ में ही रहे थे और यहीं के डी पी निगम गर्ल्स जूनियर हाईस्कूल, हुसैनगंज से चौथी कक्षा उत्तीर्ण करके गए थे। नवंबर 1962 में बाबूजी का तबादला सिलीगुड़ी होने और सिलीगुड़ी के नान फैमिली स्टेशन होने के कारण शाहजहाँपुर में नानाजी के पास रहे। 1964 में सातवीं कक्षा पास करके सिलीगुड़ी गए और वहीं से हाईस्कूल की परीक्षा 1967 में पास करके शाहजहाँपुर से इंटर फर्स्ट ईयर1968 में  किया। 1969  में इंटर फ़ाईनल मेरठ से करके, मेरठ कालेज, मेरठ से स्नातक 1971 में किया और मई  1972 से  जून 1975 तक वहीं 'सारू स्मेल्टिंग प्रा लिमिटेड' के लेखा विभाग में कार्य किया। सितंबर 1975 से जनवरी 1985 तक 'होटल मुगल शेरटन, आगरा' में फिर मार्च - 2000 तक स्वतंत्र रूप से लेखा कार्य किया। फिर ज्योतिष  क्षेत्र को अपनाया। 

जून 2006 में  यशवन्त 'बिग बाज़ार', लखनऊ ट्रेनिंग पर आया और उसे लखनऊ इतना भाया कि उसने अपना जन्म स्थान आगरा छोड़ कर मेरे जन्म स्थान वापिस लौटने का प्रस्ताव रखा। 1978 से आगरा में अपने ही घर में रहते आने के कारण हम हड़बड़ी में नहीं थे। 2007 में वह तबादला कराकर मेरठ फिर मई 2009 में कानपुर आ गया अतः सितंबर 2009 में आगरा का मकान बेच कर हम 09 अक्तूबर को लखनऊ आ गए थे और नवंबर से अपना नया मकान लेकर यहाँ रह रहे हैं। 

 लखनऊ पुनरागमन  के चार वर्ष:
वैसे तो चार वर्षों का समय अत्यल्प ही है। परंतु इन चार वर्षों में काफी कुछ ऐसा घटित हुआ है जिसे घाटे का सौदा नहीं कह सकते हैं। हालांकि मई 2010 में कानपुर -बिग बाज़ार से रिज़ाईन करवाकर यशवन्त को लखनऊ बुलवा लेना पड़ा है । घर पर ही उसने कंप्यूटर संबंधी कार्य प्रारम्भ किया जिसे आर्थिक रूप से तो सफल नहीं कहा जा सकता है किन्तु ब्लाग-लेखन के क्षेत्र हम सभी को उसके माध्यम से एक अलग पहचान मिल सकी है।इस वर्ष  ब्लाग लेखन के एक सर्वे में यशवन्त का निजी ब्लाग -'जो मेरा मन कहे' व सामूहिक ब्लाग-'नई पुरानी हलचल' तथा मेरा ब्लाग-'क्रान्ति स्वर' तीन सौ हिन्दी ब्लाग्स के बीच स्थान प्राप्त कर सके   हैं।

'क्रांतिस्वर' मेरा पहला ब्लाग है जिसका प्रारम्भ जून 2010 से हुआ है। उसके बाद 'विद्रोही स्व स्वर में', 'कलम और कुदाल', 'जनहित में', और अभी कुछ माह पूर्व 'सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयः' एवं 'साम्यवाद (COMMUNISM)' ब्लाग्स अपने चला रहा हूँ ।'जनहित' नामक एक फेसबुक ग्रुप भी जूलाई 2012 से संचालित कर रहा हूँ। दूसरों के विभिन्न ग्रुप्स में भी सक्रियता रहती है,  इनके अतिरिक्त पिछले एक वर्ष से श्रीमती जी के ब्लाग 'पूनम वाणी' का भी संचालन कर रहा हूँ। 

 परोपकार एवं सेवा भाव से हम लोगों का लेखन होता है किसी आर्थिक प्रलोभन से नहीं। अतः जहां सुयोग्य विद्वानों से सराहना मिलती है वहीं 'मेरा पेट हाऊ मैं न जानू काऊ' प्रवृति के लोगों से अवहेलना व निंदा भी। 

हमारे ब्लाग-लेखन व लखनऊ आने के कारण हमारी छोटी बहन-बहनोई हमसे बिदक गए। हमारे आगरा छोडने से पूर्व भी उन्होने कहा था कि या तो मैं उनके साथ मिल कर भोपाल में रहूँ  या पूनम के भाई साहब के साथ मिल कर पटना में। उनके अनुसार मुझे यशवन्त की पसंद को नज़रअंदाज़ करना चाहिए था जो मैंने नहीं किया। अतः मेरे साथ-साथ पूनम व यशवन्त भी उन लोगों के निशाने पर हैं। छोटी भांजी ने अपने पूना नगर में प्रवास कर रही पटना की एक ब्लागर को कालोनी की पड़ौसी होने के आधार पर गुमराह करके यशवन्त व मुझे परेशान करने हेतु प्रेरित किया। बहनोई साहब ने हमारे ताउजी के पुत्रों को गुमराह करके उनके माध्यम से हमारी कालोनी में ही हमें परेशान करने की व्यवस्था की। बाराबंकी/दरियाबाद के संपर्कों के आधार पर हमारी पार्टी भाकपा में शामिल कुछ पोंगापंथी  ब्लागर राजनीतिज्ञों   के माध्यम से हमारी स्थिति खराब करने के भी प्रयास  किए गए और किए जा रहे हैं ।

जहां तक हमारा प्रश्न है न तो हम राजनीतिक क्षेत्र का दुरुपयोग करके न ही ब्लाग क्षेत्र का दुरुपयोग करके आर्थिक कमाई करते हैं जो हमें किसी प्रकार का नुकसान इन हरकतों से हो सके। अतः हम प्रत्येक हमलावर का चाहे वह कितना भी समृद्ध व शक्तिशाली क्यों न हो डट कर मुक़ाबला करते हैं। 

एक ब्लागर साहब ने अपनी एक से अधिक पोस्ट्स में मेरे नामोल्लेख के साथ मेरे ब्लाग लेखन से दूर होने व फेसबुक में सक्रिय होने का वर्णन किया है। जबकि हकीकत यह है कि मेरे द्वारा संचालित ब्लाग्स की संख्या भी बढ़ी है और स्वभावत: पोस्ट्स की भी। मैं ब्लागर्स की आपसी गुटबाजी मे पड़े बगैर अपना लेखन जारी रखे हुये हूँ। 

 'साम्यवाद (COMMUNISM)' ब्लाग तो मुझको इसलिए बनाना पड़ा क्योंकि पार्टी के सामूहिक ब्लाग से हमारे एक राष्ट्रीय सचिव संबन्धित मेरी पोस्ट को डिलीट करके मुझे उसमें लेखन अधिकार से वंचित कर दिया गया था। ऐसा करने वाला यूनियन बैंक आफ इंडिया का कारिंदा पार्टी में दरियाबाद/बाराबंकी से संबन्धित गुमराह लोगों से प्रभावित है उसने बैंक व वकालत के लोगों को हमारी कालोनी में हमारे विरुद्ध  लामबंद कर रखा है।

कुल मिला कर  'लखनऊ पुनरागमन' हमें कुछ नए हौंसले ,नई सीख देने के कारण लाभप्रद ही रहा है बावजूद गंभीर   झंझावातों के।

   

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सोमवार, 30 सितंबर 2013

बहुत मुश्किल है कुछ यादों का भुलाया जाना (भाग-3)लखनऊ 30 सितंबर रैली -- ---विजय राजबली माथुर

आनंद प्रकाश तिवारी जी की फेसबुक वाल से
आनंद प्रकाश तिवारी जी की फेसबुक वाल सेलखनऊ 30 सितंबर  2013 रैली की एक झलक
क्योंकि लखनऊ मेरा जन्मस्थान होने और प्रारम्भिक बचपन यहीं बीतने से सदा ही मेरा प्रिय -स्थान रहा है। इसलिए आगरा से जब भी भाकपा की रैलियाँ लखनऊ आती थीं मैं अवश्य ही भाग लेने आता रहा था। आज लखनऊ में निवास करते हुये भाकपा की विशाल रैली में भाग लेने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ। मैं अपने नवीनतम ब्लाग-'साम्यवाद (COMMUNISM)' के माध्यम से इस रैली की सफलता हेतु पोस्ट्स शेयर करता रहा।  नन्ही बच्ची के उपरोक्त चित्र के माध्यम से आनंद प्रकाश तिवारी जी ने  जनता का आह्वान इस रैली में भाग लेने हेतु किया था और उन्होने 'परिवर्तन चौक' पर रैली का एक विहंगम दृश्य अपने मोबाईल के माध्यम से लेकर शेयर किया था। जब यह जत्था अग्रिम जत्थे के साथ-साथ 'परिवर्तन चौक' पर था तब प्राप्त सूचनानुसार अंतिम जत्था 'चारबाग रेलवे स्टेशन' से प्रस्थान कर रहा था। जब लगभग बीस हजार कार्यकर्ता 'ज्योतिबा फुले पार्क' रैली स्थल पहुँच चुके थे तब भी विलंब से  आने वाली ट्रेनों से प्रदर्शनकारियों का आना जारी था।

जुलूस का नेतृत्व भाकपा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड सुधाकर रेड्डी,राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अंजान,प्रदेश सचिव डॉ गिरीश चंद्र शर्मा , डॉ अरविंद राज स्वरूप एवं पूर्व प्रदेश सचिव  कामरेड अशोक मिश्रा जी ने किया। लखनऊ ज़िला काउंसिल के जत्थे का एक विशेष भाग मोटर साईकिल सवार युवा प्रदर्शंनकारी रैली में आकर्षण का केंद्र बिन्दु था ।

जहां तक रैली की भौतिक सफलता का प्रश्न है रैली पूर्ण रूप से सफल रही है और कार्यकर्ताओं में जोश का नव संचार करते हुये जनता के मध्य आशा की किरण बिखेर सकी है। लेकिन क्या वास्तव में इस सफलता का कोई लाभ प्रदेश पार्टी को या राष्ट्रीय स्तर पर मिल सकेगा?यह संदेहास्पद है क्योंकि प्रदेश में एक जाति विशेष के लोग आपस में ही 'टांग-खिचाई' के खेल में व्यस्त रहते हैं। यही वजह है कि प्रदेश में पार्टी का जो रुतबा हुआ करता था वह अब नहीं बन पा रहा है। ईमानदार और कर्मठ कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न एक पदाधिकारी विशेष द्वारा निर्लज्ज तौर पर किया जाता है और उसको सार्वजनिक रूप से वाह-वाही प्रदान की जाती है। एक तरफ ईमानदार IAS अधिकारी 'दुर्गा शक्ती नागपाल'के अवैध निलंबन के विरुद्ध पार्टी सार्वजनिक प्रदर्शन करती है और दूसरी तरफ उत्पीड़क पदाधिकारी का महिमामंडन भी। यह द्वंदात्मक स्थिति पार्टी को अनुकूल परिस्थितियों का भी लाभ मिलने से वंचित ही रखेगी। तब इस प्रदर्शन और इसकी कामयाबी का मतलब ही क्या होगा?  
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Communist aapsi dwand me hi mare za rahe hain.Vaikulpik Rajniti ke prati hatash hain.Zatiwad, swsrth aur Bhrushtachar me dube chhutbhaiyo ki vishwsniyta Parmanu karar mudde par sansad me dekh Chuke hain.
Bache DO Rajnitik Dal, Zin par druwikaran hota deekh raha hai.
Partner Politics kya kahti hai ?
Kidhar Jana chahenge ??....???

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शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

बहुत मुश्किल है कुछ यादों का भुलाया जाना (भाग-2 ) ---विजय राजबली माथुर


कामरेड डॉ गिरीश  जी
चार वर्ष पूर्व जब हम आगरा से लखनऊ आए थे तो कुछ उलझनों में फंस जाने के कारण क़ैसर बाग पार्टी कार्यालय में संपर्क न कर सके ,पहला उद्देश्य यहाँ सेटिल होना था। सेटिल होने के बाद 25 सितंबर 2010 को हम डॉ गिरीश जी से संपर्क कर सके उससे पूर्व जब भी हम गए वह बाहर के टूर पर रहे। डॉ गिरीश जी को हम आगरा से इसलिए जानते थे कि वह अक्सर ही वहाँ पार्टी कार्यालय और पार्टी कार्यक्रमों में आते रहते थे। कामरेड अशोक मिश्रा जी से भी पूर्व परिचय था किन्तु इत्तिफ़ाक से वह भी न मिल पाये थे। डॉ साहब ने प्रदेश पार्टी के मुखिया होते हुये भी जिस आत्मीयता से भेंट की वह स्मरणीय रहेगी। लगभग तीन घंटे हम उनके साथ रहे। आगरा पार्टी ,वहाँ के कामरेड्स और मेरी घरेलू समस्याओं पर भी उन्होने चर्चा की। उनका कहना था कि यदि मैं पहले मिला होता तो मेरी समस्याओं का निदान वह कामरेड ख़ालिक़ के माध्यम से सहजता से करा देते। 

जब भी कभी मैं कार्यालय में उनसे मिला वह पूर्ण सौहाद्र के साथ मिले। कामरेड मिश्रा जी ने भी पहचान लिया था। AISF के कार्यक्रम के दौरान मैं डॉ साहब के निर्देशानुसार उपस्थित रहा था। उस कार्यक्रम के समापन के अवसर पर जब डॉ साहब ने उनको सहयोग करने वालों के नाम घोषित किए तो उनमें मेरा भी नाम शामिल था। यह डॉ साहब की महानता ही थी कि मुझ जैसे क्षुद्र कार्यकर्ता का नाम भी उन्होने भरे सभागार में अत्यंत सक्रिय कामरेड्स के साथ लिया। उनके निर्देशानुसार यशवन्त ने भी अपनी उपस्थिती दर्ज कराई थी अतः उसे भी मेरे अतिरिक्त AISF के बैग डॉ साहब ने प्रदान किए। 

यों तो मैं ज़िले का कार्यकर्ता हूँ परंतु डॉ साहब के निर्देश पर जब भी उन्होने याद किया मैं हाजिर होता रहा। मई 2013 में उन्होने मुझसे प्रदेश कार्यालय में कंप्यूटर कार्य में सहयोग करने को कहा और मैं सुविधानुसार वहाँ पहुँच जाता था। परंतु जिनके साथ कार्य करना था वह किसी दूसरे का दखल नहीं चाहते थे। इस बात से डॉ साहब के टूर से लौटने पर मैंने अवगत करा दिया था और स्पष्ट कर दिया था कि इसी कारण बीच-बीच में अनुपस्थित रहा था। वह साहब डॉ साहब के सामने बड़े भोले बन जाते थे लेकिन उन के टूर पर जाते ही अपने असली रंग  में दिखने लगते थे जिन सब बातों का ज़िक्र पिछले पोस्ट्स में विस्तृत रूप से हो चुका है।

मैंने 11 जूलाई 2013 को डॉ साहब से संदेह व्यक्त कर दिया था कि वह जनाब अब 'टकराव'के रास्ते पर हैं। 13 जूलाई 2013 की मीटिंग में वह मेरी कुर्सी और मेरे पैरों पर ही ठोकरें नहीं मारते रहे बल्कि पेट में भी उंगली भोंकते रहे। मैं डॉ साहब के सम्मान के कारण चुप-चाप बर्दाश्त करता रहा किन्तु उनको बाद में सूचित कर दिया था। इसी कारण 07 सितंबर 2013 की मीटिंग में मैं अनुपस्थित (पहली बार) हुआ। 09 सितंबर को कामरेड अतुल अंजान से संबन्धित मेरी एक पोस्ट को डिलीट करने के साथ ही साथ उन प्रदीप तिवारी साहब ने मुझे ब्लाग एडमिन एंड आथरशिप से हटा दिया। छह वर्ष से पी टी साहब ने प्रदेश सचिव को ब्लाग से दूर रखा था मैंने प्रदेश सचिव डॉ गिरीश साहब एवं प्रदेश सह -सचिव डॉ अरविंद राज स्वरूप साहब को निवेदन दिया कि वे ब्लाग एडमिन बन जाएँ जिसे उन दोनों ने स्वीकार कर लिया। किन्तु पी टी साहब को तीखा चुभ गया और उस पर अंजान साहब के समाचार को ब्लाग पोस्ट के रूप में देना उनको बिलकुल भी बर्दाश्त न हुआ। 

प्रदीप तिवारी द्वारा मुझे धमकाना,ठोकर मारना,पेट में उंगली भोंकना आदि-आदि तो 'सोशल एप्रोच' है। लेकिन अंजान साहब या गुरुदास दासगुप्ता जी से संबन्धित पोस्ट मेरे द्वारा देना 'व्यक्तिगत एप्रोच' है। अतः एक नया ब्लाग-,शुरू कर दिया है। इस नए ब्लाग के माध्यम से अपने राष्ट्रीय नेताओं के विचारों को सुगमता से'साम्यवाद(COMMUNISM)'  प्रकाशित कर सकूँगा। यदि डॉ साहब मुझे बुला कर मुझसे कार्य न करवाते तो मैं आज यह नया ब्लाग चलाने के बारे में सोच भी न सकता था। अतः मैं हृदय  से आदरणीय डॉ गिरीश जी का आभारी हूँ कि उन्होने मुझे इस लायक बनने की प्रेरणा दी।

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मंगलवार, 10 सितंबर 2013

पूर्वानुमान सही निकला---विजय राजबली माथुर

http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/06/blog-post_9.html
दिये गए लिंक पर मैंने 09 जून 2013 को ही लिखा था-
1)-उनके प्रवचनों का अर्थ मैंने यह तत्काल लगा लिया था कि वह मुझे परेशान करने व उखाड़ने के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे।
2)- पी टी एस साहब ने तिकड़म करते हुये मेरा आई डी/पास वर्ड हासिल कर लिया तो उसका मुक़ाबला करने हेतु पास वर्ड भी तब्दील करना पड़ा एवं एक नई आई डी/पास वर्ड सार्वजनिक कार्य हेतु बनाना पड़ा। 
  3)-बहरहाल याह बात साफ है कि यदि मैं दिये आश्वासन की पूर्ती करता हूँ तो कितनी जोखिम उठानी पड़ेगी पी टी एस  महोदय की क्या-क्या कृपा हो सकती हैं? मुझे पूर्वानुमान है। 

http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/07/blog-post.html 

इस लिंक पर 03 जूलाई को लिखा था-

1)-"पी टी एस के मुझसे खफा होने का कारण मात्र इतना सा है कि उनके बड़े नेता जी  ने मुझे उनकी सहायता करने को कहा है जिसे मैंने सहर्ष निस्वार्थ भाव से स्वीकार कर लिया है। पहले उन्होने इर-रिलीवेंट कहानियाँ सुना -सुना कर मुझे भयभीत करने का प्रयास किया जिसमें असफल रहने पर  फिर तांत्रिक  प्रक्रियाओं के सहारे से मुझे ही नहीं परिवारी जनों को भी त्रस्त करने लगे। एक रोज़ मार्ग में साईकिल में पीछे से 'उ.प्र.सचिवालय' की तख्ती लगाए कार ने  टक्कर मारी तो अगले दिन एक स्कूटर ने सामने से हैंडिल में टक्कर मारी।फिर उन्होने सार्वजनिक ब्लाग में लेखन अधिकार देने के साथ-साथ एडमिन राईट्स भी दे दिये जिसके आधार पर उनके सामने मुझे अपनी आई डी से ब्लाग पोस्ट निकालने को कहा। स्व्भाविक रूप से उन्होने आई डी पासवर्ड हासिल किया होगा जिसे मैंने घर पहुँचने से पूर्व ही पुत्र के माध्यम से बदलवा लिया और वह अपने मिशन में असफल रह गए। लेकिन अब मैंने सार्वजनिक लेखन हेतु एक नई आई डी ही बना ली अतः पुनः अपने सामने उनके द्वारा पोस्ट डलवाने पर मुझे कोई दिक्कत नहीं रही किन्तु उन्होने इसके पासवर्ड से खिलवाड़ करने का प्रयास किया जिससे यह आभास हुआ कि वह मूलतः मेरी निजी आई डी का पासवर्ड हस्तगत करके मेरे ब्लाग में पूना प्रवासी ब्लागर और उसके समर्थकों के संबंध में लिखे विषय में हेरा-फेरी करके उन लोगों को साफ-साफ बचाना चाहते थे। "

2)-जो बड़े कम्युनिस्ट के रूप में स्थापित होने के बाद भी क्षुद्र ब्लागर्स के हितों के संरक्षणार्थ तांत्रिक प्रक्रियाओं का सहारा लेकर खुद को सहायता देने वाले को ही तहस-नहस कर देना चाहते हैं। यह खुद भी एक जन्मपत्री का वैवाहिक विश्लेषण मुझसे प्राप्त कर चुके हैं। 

http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/08/13.html 
इस लिंक पर लिखा था-

 1)-मैंने एजेंडा से बाहर के उस प्रस्ताव को जो अध्यक्ष की अनुमति के बिना ही रखा गया था मीटिंग -मिनिट्स में दर्ज ही नहीं किया था। अतः घोटालू साहब की योजना ध्वस्त हो रही थी जिस कारण वह बौखला गए थे और मेरी कुर्सी में लातें ठेलते-ठेलते मेरे पैरों पर भी ठोकर मारने लगे और दबाव डालने लगे कि मैं उस अवैध प्रस्ताव को मिनिट्स में दर्ज करूँ जबकि मीटिंग संचालक एवं अध्यक्ष ने और संपादक महोदय ने भी मुझसे न लिखने पर कोई आपत्ति न की थी। घोटालू साहब की अभद्रता की इंतिहा तब हो गई जब वह मेरे पेट में उंगली भोंक कर लिखने का दबाव बनाने लगे। मैंने पूरी तरह घोटालू साहब और उनके दुष्कृत्यों की उपेक्षा कर दी। 

2)-वस्तुतः पूना प्रवासी भृष्ट-धृष्ट -निकृष्ट-ठग ब्लागर की एक साथी घोटालू साहब की भाभी होती हैं जिनका ताल्लुक हमारे गृह ज़िले से है और वही घोटालू साहब के परम मित्र एक राजनीतिक दल के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष की भी रिश्तेदार हैं जिनको घोटालू साहब ने एक पूर्व विधायक के अतिरिक्त हमें परेशान करने हेतु लगाया था।  इन सबके सम्मिलित प्रयासों के बावजूद मैंने घुटने नहीं टेके तो घोटालू साहब अब निकृष्टत्तम धूर्तता पर उतर आए हैं। 

http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/08/blog-post_18.html 
 इस लिंक पर लिखा था-
 
"भृष्ट-धृष्ट ब्लागर और उसके साथी ब्लागर्स तथा घोटालू साहब मेरे ज्योतिषीय विश्लेषणों को गलत साबित करके  'पोंगापंथी-ढ़ोंगी-ठग व लुटेरे' लोगों का बचाव करना चाहते हैं जो जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते हैं। ये लोग शोषकों-उतपीडकों/व्यापारियों/उद्योगपतियों के दलाल हैं और उनके ही दूसरे ढ़ोंगी-पोंगापंथी दलालों का संरक्षण करने हेतु मुझ पर प्रहार करवा रहे हैं।"
http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/09/1.html

इस अंक में लिखा था-
13 जूलाई को उसी शख्स ने मीटिंग के दौरान मेरे कुर्सी पर,पैरों पर अपने पैरों से  और मेरे पेट  पर अपनी उंगली से प्रहार किए थे। उसी की कारगुजारी के कारण मुझे 18 वर्ष बाद बाहर के डाक्टर का आसरा लेकर पुत्र का इलाज करना पड़ा। तब से अब तक परिवार के सभी सदस्यों के इलाज पर लगभग रु 2000/-फिजूल खर्च हो चुके है। इस नए रमेश कटारा ने अपने मित्र एक दूसरे दल के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष के माध्यम से मुझे पार्टी से अलग करवाने का विफल प्रयास किया था और अब सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ लोगों को मेरी छवी खराब करने के अभियान में लगाया है।
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मैंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ब्लाग में 04 जून 2013 को पहली पोस्ट दी थी और कल दिनांक 09 सितंबर 2013 की पोस्ट देने के बाद उन तिकड़मी महोदय ने मुझे लेखन अधिकार से वंचित  कर दिया है। 04 जून तक ब्लाग फालोर्स की संख्या छह वर्षों में कुल 50 थी और 09 सितंबर तक कुल 68 अर्थात जहां छह वर्षों में पार्टी ब्लाग का प्रचार नहीं किया गया था वहीं मेरे प्रयत्नों से 95 दिनों में कुल 18 नए फालोर्स बढ़ गए थे। पिछले छह वर्षों में प्रदेश पार्टी सचिव को ब्लाग से दूर रखा गया था किन्तु मैंने प्रदेश पार्टी सचिव एवं सहायक सचिव को भी ब्लाग लेखन में एडमिन बनवा दिया था। शायद यह बात भी अहंकारी प्रदीप तिवारी साहब को अखरी होगी इसी लिए मुझे लेखन अधिकार से वंचित कर दिया -उनकी तानाशाही उनको मुबारक। हो सकता है कि अब वह मुझे पार्टी से निकलवाने का भी उपक्रम करें। 

उनको तो पार्टी पोस्ट से आय होती है लेकिन मैं सार्वजनिक किसी भी संस्था और पार्टी के जरिये कभी भी कोई कमाई नहीं करता रहा हूँ इसलिए मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है। मैं अपने निजी 5 और पत्नी का एक कुल 6 ब्लाग पहले से ही संचालित कर रहा हूँ इसलिए पार्टी ब्लाग से हटाये जाने के लिए प्रदीप तिवारी साहब का शुक्रिया अदा करता हूँ। 

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शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

बहुत मुश्किल है कुछ यादों का भुलाया जाना (भाग-1 ) ---विजय राजबली माथुर

आर्यसमाज -कमलानगर,आगरा में यशपाल आर्य जी ने एक प्रवचन देते हुये एक ब्रिटिश जज साहब का वृतांत सुनाया था जिसके अनुसार वह जज साहब शार्ट -कट के लिए घर से अदालत जाते वक्त 'रेड लाईट एरिया' का रास्ता अपना लेते थे। यद्यपि वह संयमित प्राणी थे किन्तु उनके अवचेतन मस्तिष्क पर वहाँ चल रही गालियां अंकित हो गई थीं। जब वृद्धावस्था में वह गंभीर रुग्ण हुये और अनकांशस  रहने लगे तब कभी-कभी उनके मुख से वे भद्दी गलियाँ निकल जाती थीं जो उन्होने कभी रास्ते में सुनी थीं। डाक्टरों ने जब इसकी खोज की तब पता चला कि जज साहब अदालत जाने के लिए जिस रास्ते का उपयोग करते थे ये गालियां उसी का दुष्परिणाम हैं। यह तो अवचेतन मस्तिष्क की बात थी। किन्तु चेतन अवस्था में कुछ घटना-क्रम इस प्रकार असर डालते हैं कि चाह कर भी उनको भुलाना संभव नहीं होता क्योंकि फिर-फिर उसी प्रकार की घटनाओं का जब-जब दोहराव होता है तब-तब उन पुरानी घटनाओं की यादें तरो-ताजा हो जाती हैं। 

कामरेड रमेश मिश्रा :
होटल मुगल शेरटन,आगरा से 'सुपर वाईजर  अकाउंट्स' की पोस्ट से बर्खास्तगी को कानूनी चुनौती देने के दौरान कामरेड अब्दुल हफीज साहब से संपर्क हुआ था जो त्याग की सच्ची मूर्ती थे और उनको संत कामरेड की संज्ञा प्राप्त थी। उनको लोग प्यार से 'चचे' भी पुकारते थे और वह आगरा में भाकपा के पर्यायवाची थे। कम्युनिस्ट पार्टी से अभिप्राय आम जनता में चचे की पार्टी से था। यह ठीक उसी प्रकार था जैसे कि लखनऊ में कम्युनिस्ट पार्टी से अभिप्राय यहाँ के आम नागरिक कामरेड अतुल अंजान की पार्टी से लेते हैं। हफीज साहब ने पार्टी के आडिटर कामरेड हरीश आहूजा एडवोकेट के पास मुझे भेज दिया जिन्होने मेरा केस तैयार कराया। कामरेड आहूजा ने मुझे भाकपा में शामिल कर लिया। वह प्रत्येक ब्रहस्पतिवार को 'मजदूर भवन' पर एक स्कूल चलाते थे जिसमें बतौर पार्टी शिक्षक कामरेड डॉ रामगोपाल सिंह चौहान,कामरेड डॉ महेश चंद्र शर्मा और पार्टी के जिलामंत्री कामरेड रमेश मिश्रा आया करते थे।

एक दिन मैं किसी और कार्य से मजदूर भवन की तरफ से निकल रहा था तो आहूजा साहब ने इशारा करके मुझे पास बुलाया और कहा कि आपको डॉ चौहान और डॉ शर्मा पार्टी आफिस में याद करते हैं और आप कल ही उनसे संपर्क करें और वहीं जाया करें यहाँ आने की आवश्यकता नहीं है। कामरेड डॉ चौहान साहब ने मुझे पार्टी कार्यालय में कार्य करने को कहा और मैं उनके तथा डॉ शर्मा जी के निर्देशन में  उनको सहयोग करने लगा। जिलमंत्री कामरेड रमेश मिश्रा जी ने मुझे अपने घर से कुछ पार्टी साहित्य भी पढ़ने को दिया और कई सभाओं में मुझे मेरे घर से लेकर अपने साथ गए और वापिस भी घर पहुंचा देते थे। डॉ चौहान के बीमार पड़ने पर उनके सुझाव पर मुझे ज़बरदस्ती ज़िला कोषाध्यक्ष के पद पर नियुक्त करा दिया। उनका पूर्ण विश्वास मुझे हासिल रहा। प्राइमरी शिक्षक संघ के एक नेता कामरेड रमेश कटारा जो कुछ 'तांत्रिक' प्रक्रियाओं के भी विशेज्ञ थे एक के बाद एक मिश्रा जी के विश्वस्तों को उनसे दूर कराते जा रहे थे। कटारा साहब ने मिश्रा जी का मस्तिष्क जाम कर दिया था और उनका विवेक समाप्त कर दिया था उनके बड़े पुत्र को पढ़ाई से विरक्त कर दिया था। उनकी निगाह मिश्रा जी का कारोबार हड़पने पर लगी थी जिसके लिए उनको उनसे सहयोग करने वालों से दूर करना ज़रूरी था। मिश्रा जी के माध्यम से कटारा साहब प्रदेश कंट्रोल कमीशन में शामिल हो गए थे। उनकी फितरत के कारण मुझे भी 1994 में भाकपा से अलग होना पड़ा था। 

कई आंदोलनों में मिश्रा जी कलेक्टरेट पर मिलते थे और घरेलू हाल-चाल पूछते रहते थे। एक बार दयालबाग में इत्तिफ़ाकीया वह मिल गए तो बोले आजकल दिखाई नहीं पड़ते क्या बात है? मैंने जब कहा कि अब मैं किसी भी राजनीतिक दल में नहीं हूँ और निष्क्रिय हूँ। तब कामरेड मिश्रा जी ने कहा कि यह नहीं हो सकता कि एक राजनीतिक व्यक्ति निष्क्रिय बैठा रहे आप को वापिस अपनी मूल पार्टी में लौटना होगा मैं आपके घर आऊँगा। और वाकई मिश्रा जी मुझे मेरे घर से अपने साथ लेकर पार्टी कार्यक्रमों में शामिल करने लगे जबकि औपचारिक रूप से मैं पुनः सदस्य भी नहीं बना था।2006 में  आगरा कमिश्नरी पर संसद-सदस्य  राज बब्बर के साथ डॉ गिरीश (जो अब प्रदेश सचिव हैं) एक प्रदर्शन में शामिल हुये थे। मिश्र जी मुझे लेकर गए थे और पार्टी के नए कार्यालय पर चलने को कहा था जहां डॉ गिरीश जी एक ट्रेक्टर ट्राली पर बैठ कर गए थे मैं भी उसी में था। पार्टी कार्यालय पर डॉ गिरीश जी की उपस्थिती में कामरेड मिश्रा जी ने मुझे पुनः सदस्यता प्रदान करने की औपचारिकता पूर्ण की थी। 2008 के सम्मेलन में मिश्रा जी ने मुझे भी सह-सचिव के रूप में अपने साथ नियुक्त किया था। किन्तु कुछ घरेलू कारणों से मुझे 2009 में  आगरा छोड़ कर लखनऊ सेटिल होना पड़ा और अब लखनऊ की पार्टी ज़िला काउंसिल में सक्रिय हूँ।

आज चार वर्ष बाद अचानक कामरेड रमेश मिश्रा जी की याद आने का प्रबल कारण यह है कि जिस रमेश कटारा को मिश्रा जी ने प्रदेश कंट्रोल कमीशन में शामिल कराया था और जिसके कारण मुझसे उनकी दूरी बनी थी उसको खुद मिश्रा जी ने ही पार्टी से निष्कासित करा दिया था और उसी के बाद मुझसे संपर्क किया था। आज उस रमेश कटारा का नया अवतार प्रदीप तिवारी के रूप में मुझे नज़र आ रहा है जिसने 12 जूलाई को डॉ गिरीश जी की जीप के साथ एक हादसा करने में सफलता प्राप्त की थी।13 जूलाई को उसी शख्स ने मीटिंग के दौरान मेरे कुर्सी पर,पैरों पर अपने पैरों से  और मेरे पेट  पर अपनी उंगली से प्रहार किए थे। उसी की कारगुजारी के कारण मुझे 18 वर्ष बाद बाहर के डाक्टर का आसरा लेकर पुत्र का इलाज करना पड़ा। तब से अब तक परिवार के सभी सदस्यों के इलाज पर लगभग रु 2000/-फिजूल खर्च हो चुके है। इस नए रमेश कटारा ने अपने मित्र एक दूसरे दल के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष के माध्यम से मुझे पार्टी से अलग करवाने का विफल प्रयास किया था और अब सत्तारूढ़ पार्टी के कुछ लोगों को मेरी छवी खराब करने के अभियान में लगाया है। काश आज कामरेड रमेश मिश्रा जी प्रदेश में पदाधिकारी बने होते तो इस नए रमेश कटारा  को उसका सही रास्ता दिखा देते। 




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