सोमवार, 20 अप्रैल 2020

कोरोना लाकडाउन नौकरियों में अनिश्चितता व संघर्ष का जनक

२० अप्रैल हमारी दिवंगत माँ  का भी जन्मदिन है और हमारे दिवंगत छोटे बहनोई का भी ।
बहन ने माँ  को बताया था कि कमलेश बाबू को टिंडे की सब्जी पसंद नहीं है कभी नहीं खाते है। जब वह पहली बार बहन के साथ हमारे घर शाहगंज आगरा के  प्रतापनगर वाले किराये के  मकान में आए थे। बउआ (माँ ) ने भरवां टिंडे की सब्जी बना भोजन के साथ परोसी थी , वह स्वादपूर्वक खा  गए बल्कि और की मांग भी की। फिर कमलानगर , आगरा वाले अपने मकान में भी कई  बार भरवां टिंडे की सब्जी वह शौक से खाते रहे। बउआ व कमलेश बाबू के जन्मदिन के अवसर पर अकस्मात यह पुरानी घटना सादर स्मरण हो आई। 

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१९७२ और २०२० में फ़र्क
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१५ मई १९७२ को  सरधना रोड ,कंकरखेड़ा, स्थित जिस फेक्टरी में बी ए कर के बेरोजगार होने के कारण  मैंने पहली नौकरी अकाउंट्स विभाग में शुरू की थी  वह जैनियों की थी और उसमें एक क्लर्क जैनी थे, कैशियर मालिकों के मामा थे और मेनेजर अकाउंट्स रिटायर्ड बैंक मेनेजर थे। मेरे पास कोई अनुभव नहीं था जैन साहब बताने को तैयार नहीं थे और मुझको अनफ़िट और सरप्लस बताते थे  । मेनेजर साहब कमर्शियल अकाउंट्स से अनभिज्ञ थे ।
पुरानी फ़ाइलें मेनेजर साहब से मांग कर अध्ययन करके दो  दिन बाद मैंने मेनेजर साहब से कुछ वाउचर्स मुझसे भी बनवाने का निवेदन किया और मैं भी वाउचर्स बनाने लगा तब वह जैन साहब मेनेजर साहब से कहने लगे आप मेनेजर हैं केवल वाउचर्स पास कीजिए चेक करने को उनको दिलवाएं।
दो - तीन दिन बाद वह मेनेजर साहब से बोले अब इनको काम आ गया है यही सारे वाउचर्स बनाएंगे और वह चेक करेंगे, वाउचर नहीं बनाएंगे सिर्फ वाउचर्स  देखेंगे । न तो मेनेजर साहब को न ही मुझको आपत्ति थी कुछ माह बाद ही  मुझको अनफ़िट और सरप्लस  बताने वाले  जैन साहब ने मुझे  बिल पेमेंट्स,चेक बनाना सब कुछ सौंप दिया ।
सवा  तीन साल मैं वहाँ रहा मेरे संबंध जैन साहब से मधुर रहे फिर वह भी सहयोग करते रहे।

२०२० मे मुझे निजी संस्थान में कार्यरत लोगों से जो सूचनाएं मिलती हैं उनमें सभी संस्थानों में सीनियर्स जूनीयर्स को प्रतिद्वंदी मान  कर उखाड़ने के प्रयासों में संलग्न पाए गए हैं। कोरोना लाकडाउन में नौकरियां जाने की आशंका में सीनियर्स अपने वरिष्ठ जूनियर के विरुद्ध कई  जगह षड्यंत्रों में मशगूल हो गए हैं। क्योंकि सेवायोजक कहीं पुराने ज्यादा वेतन वाले कर्मचारी को हटा कर कम वेतन वाले उसके निकटतम जूनियर से काम न चला  ले  अतः उसके भी जूनि यर्स को उसके विरुद्ध भड़काना सीनियर मोस्ट का शगल बन गया है।कोरोना लाकडाउन नौकरियों में अनिश्चितता व संघर्ष का जनक सिद्ध हो रहा है।  

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गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

69 वें वर्ष पर प्राप्त बधाई संदेश



पुनः लखनऊ 2009 में आ गए थे और जून 2010 से ब्लाग प्रारंभ करके लेखन से संबंधित लोगों से संपर्क स्थापित हो गए थे। 2011 से फ़ेसबुक पर भी लोगों से संपर्क बने इनमें से शहर - स्थित कुछ लोगों से व्यक्तिगत संपर्क भी हुए।रिश्तेदार और  गैर रिश्तेदार ऐसे कुछ लोग जन्मदिन पर बधाई संदेश भेजते रहे हैं लेकिन इस बार कुछ अधिक लोगों ने कुछ अधिक तौर पर शुभकामनाएं दी हैं उनमें से कुछ प्रस्तुत हैं। 































1963-64 की शाहजहांपुर जिला वाद - विवाद प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार के रूप में जयशंकर प्रसाद जी के  काव्य ' कामायनी ' :


मेरठ कालेज, मेरठ में 1970-71 में भाषण गोष्ठी में द्वितीय पुरस्कार के रूप में प्राप्त चार पुस्तकें :









होली के अवसर पर हवन।

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शनिवार, 4 मई 2019

कल - आज और कल ------ विजय राजबली माथुर

कल - आज और कल 
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कभी - कभी कुछ विशेष परिस्थितियों में अतीत के कुछ पल यों मस्तिष्क में घूम जाते हैं जैसे यह पिछले कल के दिन की ही बात है। 
* ठीक 50 वर्ष पूर्व 1969 में जब मेरठ कालेज , मेरठ में बी ए में प्रवेश लिया तब राजशास्त्र ( pol sc), अर्थशास्त्र ( Economics ), के साथ समाजशास्त्र ( Sociology ) भी मुख्य विषयों में था। 
** प्रथम वर्ष में समाजशास्त्र के एक अध्यापक एक विषय के अध्ययन में कुछ व्यावहारिक अनुभवों से यह बता रहे थे कि, कैसे उत्तर - प्रदेश का वणिक वर्ग व्यापार में पिछड़ता गया और सिन्धी समुदाय यहाँ के व्यापार जगत में फैलता व फूलता गया। 
*** उनका कहना था कि, मेरठ कालेज , मेरठ आने से पूर्व उनको प्रथम नियुक्ति गोरखपुर के एक ग्रामीण क्षेत्र के कालेज में मिली थी। वह नए - नए गए थे और एक कमरा किराये पर लेकर रहते व अपना भोजन स्वम्य ही बनाते थे। घर से लाये रुपए खर्च हो गए थे और अभी प्रथम वेतन मिलने में कुछ दिन का विलंब था। 
**** वह जिस दुकान से सामान खरीदते थे उस वैश्य दुकानदार ने उनको उधार देने से इंकार कर दिया। मजबूरन उनको सिन्धी समुदाय के बड़े दुकानदार से संपर्क करना पड़ा । वह समझते थे दुकान बड़ी है तो दाम भी ज्यादा होते होंगे। 
***** उन प्रोफेसर साहब ने अपना व कालेज का परिचय देकर अपनी समस्या बताते हुये कुछ सामान उधार लेने व वेतन मिलने पर भुगतान करने की बात कही। 
****** उन सिन्धी दुकानदार ने प्रोफेसर साहब को जो जवाब दिया उससे वह आश्चर्यचकित हुये थे । उनसे उन सिन्धी दुकानदार का कहना था आप बाहर से आए हैं हमारे अतिथि हुये और आपका ख्याल रखना हमारी ज़िम्मेदारी है आप निश्चिंत रहें और पैसों की चिंता न करें । उस दिन के बाद से जब तक प्रोफेसर साहब उस कालेज में रहे उसी सिन्धी दुकानदार से ही सब सामान लेते रहे। 
******* वैश्य दुकानदार ने तात्कालिक लाभ देखा जबकि सिन्धी दुकानदार ने दूरदर्शिता पूर्वक निजी संबंध स्थापित कर लिए । 
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1985 से 2000 तक शू चैंबर, हींग की मंडी, आगरा में पार्ट टाईम बेसिस पर एकाउंट्स जाब करता था और सभी दुकानदार सिन्धी थे। सभी का व्यवहार मालिक - कर्मचारी के हिसाब से न होकर व्यक्तिगत था और किसी ने भी गैर हाजिरी या निर्धारित समय से कम ड्यूटी करने पर भी कभी भी वेतन कटौती नहीं की। जबकि उससे पूर्व बेलनगंज, आगरा की एक इलेक्ट्रिक फर्म की नौकरी मात्र दो माह में ही छोडनी पड़ी क्योंकि उन वैश्य दुकानदार ने दो दिन गैरहाजिरी की वेतन कटौती कर ली थी। 
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मेरठ में 1969 में समाजशास्त्र के प्रोफेसर साहब के बताए सिन्धी - वैश्य सामाजिक व्यवहार संदर्भों की पुष्टि 1985 से 2000 के मध्य आगरा में हो चुकी है।आने वाले समय में इसकी और परीक्षा हो जाएगी।

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मंगलवार, 30 अक्टूबर 2018

सरकारी परीक्षा,सरकारी कर्मचारी,पुलिसकर्मी और परीक्षार्थी ------ विजय राजबली माथुर

सरकारी परीक्षा,सरकारी कर्मचारी,पुलिसकर्मी और परीक्षार्थी :
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28 अक्तूबर 2018 को मतदाता दिवस भी था और उसी दिन PCS की परीक्षाएं भी थीं । दोनों कार्य कुछ विद्यालयों में एक साथ होने थे, किन्तु परीक्षा केन्द्रों के व्यवस्थापकों ने सरकारी कर्मियों को विद्यालय भवन के भीतर BLOs को बैठने भी नहीं दिया था। मतदान कर्मियों में रोष भी था लेकिन मतदाताओं के हितों का ख्याल भी । अतः उनके वरिष्ठ ने एक मतदान केंद्र पर अपने साथियों को भी समझाया और ACM से भी फोन पर बात की कि, कम से कम विद्यालय से कुछ बेंच बैठने हेतु दिलवा दें जिससे मतदाताओं का कार्य सम्पन्न किया जा सके। उनकी बात पर अमल हुआ और मतदाताओं की बात सुनी जा सकी। 
* जब तक व्यवस्था नहीं हुई थी वह वरिष्ठ महोदय अपने साथियों को समझा रहे थे कि हम परीक्षार्थियों के एहसानमंद हैं क्योंकि विभिन्न परीक्षाओं से सरकार जो राजस्व अर्जित करती है उसी से अपने कर्मचारियों को वेतन देती है। उन्होने अपनी बात की पुष्टि में बताया कि कोई भी सरकारी परीक्षा निशुल्क नहीं होती और जितनी पोस्ट्स निकलती हैं उसके अनुपात में कई गुना अधिक बेरोजगार आवेदन करते हैं और बहुत कम धन ही परीक्षाएं सम्पन्न करवाने पर व्यय होता है। यह अधिशेष शुल्क सरकार की शुद्ध आय है जिसे वह अपने कर्मियों के वेतन - भत्ते देने में इस्तेमाल करती है। 
इस गणित को समझा कर उन्होने अपने साथियों के रोष को विद्यालय और परीक्षार्थियों से हटवा लिया। 
** इस व्याख्या के संदर्भ में देखें तो 831 पोस्ट्स हेतु इस PCS परीक्षा के लिए कुल 635844 ( छह लाख पैंतीस हजार आठ सौ चवालीस ) आवेदक परीक्षार्थियों ने @120 / - रु के हिसाब से सरकार को रु 76325680 (सात करोड़ तिरेसठ लाख पच्चीस हजार छह सौ अस्सी रुपये ) का भूगातान किया था जिसमें से प्रदेश के 29 जिलों के परीक्षा केन्द्रों का व्यय घटा कर सरकार के पास कई करोड़ रुपयों की बचत हुई। 
वर्ष भर में कई प्रकार की परीक्षाएं होती हैं और सभी में सरकार बेरोजगार युवकों से खूब कमाई करती है। 
*** मतदान कर्मियों के साथ - साथ पुलिस कर्मियों की एक अलग समस्या थी कि उनको इस ड्यूटी के बाद रात के ग्यारह बजे तक अपने क्षेत्र के चौराहों पर भी ट्रेफिक कंट्रोल करना होता है फिर अगले दिन समय से ही ड्यूटी भी पहुँचना होता है। पुलिस कर्मियों की छुट्टियाँ दीपावली पर्व तक केनसिल कर दी गई हैं वे ज़रा सा भी आराम नहीं कर सकेंगे और ऐसा प्रत्येक पर्व के आस - पास होता है। पुलिस कर्मियों की वेदना थी कि किसी भी राजनीतिक दल की सरकार पुलिस कर्मियों का कोई ख्याल नहीं रखती है बल्कि सबके निशाने पर पहले पुलिसकर्मी ही रहते हैं। 
**** परीक्षार्थियों की वेदना थी कि, बेरोजगार युवकों के अभिभावकों पर यह परीक्षा शुल्क अनावश्यक बोझ होता है अतः सभी परीक्षाएं सरकार की ओर से निशुल्क होनी चाहिए।

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सोमवार, 24 सितंबर 2018

ये ऊल - जलूल नियम फेसबुक के इनके क्या कहने ! ------ विजय राजबली माथुर



*****  इस ब्लाग का प्रारम्भ 03 अगस्त 2010 से किया गया था *****


यह समीक्षा  NDTV के वरिष्ठ पत्रकार द्वारा की गई थी जो 'हिंदुस्तान, लखनऊ  02 फरवरी 2011 ' के अंक में प्रकाशित हुई थी। ब्लाग में प्रकाशित पोस्ट्स को समय समय पर फेसबुक और इसके विभिन्न ग्रुप्स में शेयर किया जाता रहा है किन्तु 21 सितंबर 2018 को हमारी दो पोस्ट्स को फेसबुक द्वारा हटा दिया गया है , क्योंकि उनके अनुसार कुछ लोगों ने इन पोस्ट्स को एब्युसिव बताया है  :








जबकि  हमारे न्यूयार्क निवासी चाचा ने इसके लिए यह प्रशंसा पत्र भेजा है  : 


इस ब्लाग  के अतिरिक्त हमारे दूसरे ब्लाग की समीक्षा  ' जनसंदेश टाईम्स , लखनऊ ' में डॉ जाकिर आली रजनीश द्वारा भी प्रकाशित कराई गई है : 



न तो फेसबुक के पास ऐसा कोई साधन या उपकरण है न  ही यह जांच करना संभव है कि, रिपोर्ट करने वालों का मन्तव्य क्या है ? और वे किस तथ्य को एब्युसिव कह रहे हैं इस की ही कोई जानकारी फेसबुक ने नहीं दी है , बस कुछ लोगों ने रिपोर्ट कर दी और उनके द्वारा  ' विद्रोही स्व - स्वर में ' ब्लाग को ब्लाक कर दिया गया है। ऐसे ही पहले हमारे एक और ब्लाग  ' सुर - संगीत ' को ब्लाक कराया जा चुका है। यदि अन्य ब्लाग्स भी कुछ लोगों के कहने पर फेसबुक द्वारा ब्लाक कर दिये जाएँ तो कोई ताज्जुब नहीं होगा क्योंकि ज्वलनशील प्रवृति के लोग जो खुद  कुछ लिख नहीं सकते दूसरे के लिखे को भी सबके सामने आने से रोकना चाहते  हैं फिर ऐसा ही कर सकते हैं भले ही एक ही व्यक्ति द्वारा अनेक फेक आई डी बना कर ऐसी रिपोर्ट्स की गई हों । जो फिर भी पढ्ना  चाहेंगे वे सीधे ब्लाग्स पर जाकर पढ़ ही लेंगे तो फेसबुक के इन प्रतिबंधों का औचित्य क्या है ? 

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बुधवार, 19 सितंबर 2018

किताबें और उनका प्रभाव ------ विजय राजबली माथुर



जी हाँ पत्थर के टुकड़ों को देवी - देवता की मान्यता देकर समाज की जमीन को कब्जे में लेकर फिर कोई धंधा करना ऐसे लोगों का उद्देश्य होता है। बुद्धि, ज्ञान और विवेक से रहित अपने जीवन से डरे हुये लोग ऐसे अवैद्ध कर्म करने वालों के मंसूबे पूरे करने में मदगार बनते हैं ------


विज्ञान और धर्म : विभ्रमकारी हैं दोनों  प्रचलित धारणायेँ : 
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1-  विज्ञान :  का तात्पर्य किसी भी विषय के नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्ययन से होता है परंतु खुद वैज्ञानिक होने का दावा करने वाले सिर्फ उसी अध्ययन को विज्ञान मानते हैं जिसे बीकर द्वारा प्रयोशाला में सिद्ध किया जा सके।
2- धर्म : का तात्पर्य ' सत्य,अहिंसा(मनसा- वाचा - कर्मणा       ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य ' के समुच्य से है जो शरीर,परिवार,समाज,और राष्ट्र के लिए धारण करने योग्य है। परंतु पोंगा - पंडित निहित स्वार्थों के कारण ' ढोंग-पाखंड-आडंबर ' को धर्म के रूप में प्रचारित करते हैं और वैज्ञानिक  तथा एथीस्ट भी उसे ही सही मानते हुये 'धर्म' का अनर्गल विरोध करते हैं।
3- एक वैज्ञानिक महोदय एक साईट पर बहस में भाग लेते हुये घोषणा करते हैं कि, वैज्ञानिक आधार पर आत्मा होती ही नहीं है। गायत्री परिवार की एक पुस्तक में आत्मा का वजन 20 ग्राम बताया गया है जबकि दोनों ही तथ्य गलत हैं।
4- आत्मा : वस्तुतः ऊर्जा  (एनर्जी ) है। वैज्ञानिकों के अनुसार ENERGY IS GHOST , इससे उनका क्या तात्पर्य है स्पष्ट नहीं है।यथार्थत : आत्मा एक FLUID है जिसका न कोई आकार होता है न ही कोई प्रकार न ही वजन। बल्कि आत्मा जिस शरीर में होती है उसमें पूर्ण रूप से फैलाव के साथ होती है। 20 ग्राम से कम वजन के जीवों में भी आत्मा का संचार होता है। जिस प्रकार ऊर्जा अदृश्य है उसी प्रकार आत्मा।
5- जब ऊर्जा - ENERGY का अस्तित्व स्वीकारा जाता है तब तथाकथित वैज्ञानिक आत्मा को अस्वीकार करके अपनी संकीर्ण - संकुचित सोच को ही उजगार करते हैं और अप्रत्यक्ष रूप से ढोंगियों,पाखंडियों व आडंबरधारियों का ही पक्ष ले रहे होते हैं।   


Kanupriya

https://www.facebook.com/kpg236/posts/2197014866991682

  कनुप्रिया जी  की इस पोस्ट से  किताब (पुस्तक ) का ज़िक्र पढ़ कर मुझे 59 वर्ष पूर्व की बातें ज्यों की त्यों याद आ गईं तब मैं 7 वर्ष का था और मेरे पिताजी मेरे लिए प्रत्येक रविवार को ' स्वतंत्र भारत ' अखबार ले देते थे तब 05 पैसे का होता था। मैं सिर्फ बच्चों वाला भाग ही नहीं राजनीतिक खबरें भी पढ़ता था। इसलिए तीन  साल बाद वह अपने कार्यालय की लाईब्रेरी से साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, सारिका, सरिता जैसी पत्रिकाएँ और कुछ राजनीतिक उपन्यास भी ( जिनमें कम्युनिस्ट पार्टी की गुप्त बैठकों का भी उल्लेख था ) ला देते थे। चूंकि मैं खेल वगैरह में भाग नहीं लेता था इसलिए रिश्तेदार भी किताबें ही देते थे। जाब में आने पर सहकर्मी भी पुस्तकें पढ़ने को देते थे उनको लौटाने से पहले महत्वपूर्ण बातों को मैं लिख कर रख लेता था। जिन छोटे बच्चों को कुछ भेंट करना होता उनके अनुसार किताबें ही भेंट करता था । पुत्र को भी किताबों का शौक हो गया और वह भी किताबें खरीदता रहता है। मेरा ख्याल है अगर हम बड़े लोग बच्चों को किताबों का महत्व समझाएँ तो वे ज़रूर समझेंगे। किताबों ने ही मुझे तो होम्योपैथी और ज्योतिष भी सिखा दीं और इसी शौक के कारण अखबारों में लिखने व कुछ साप्ताहिक में उप- संपादक के रूप में भी जुड़ा तथा अब कई ब्लाग्स भी लिख ले रहा हूँ। किताबें सच्ची मित्र व पथ - प्रदर्शक भी होती हैं।



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