सोमवार, 28 नवंबर 2011

आगरा/1991 -92 (भाग-9 )

गर्मियों की छुट्टी मे अक्सर शरद की माँ कुक्कू के पास कुछ दिन ज्यादा रहने को चली जाती थीं और शालिनी से कह जाती थीं कि जल्दी-जल्दी उनके क्वार्टर पर जाकर हाल-चाल लेती रहें। शालिनी सुबह ही रात की भी सब्जी बना कर फ्रिज मे रख देती थीं और यशवन्त को लेकर मेरे ड्यूटी जाने के वक्त वहाँ रुक जाती थीं। मै सुबह तो सीधे ड्यूटी निकल जाता था परंतु इन दोनों को लेने शाम को वहाँ थोड़ी देर रुकना ही होता था। बच्चे तो हमेशा टी वी पर ही बैठे रहते थे ,मुझे टी वी का शौक न था अतः शाम के वक्त आँगन मे बैठना पसंद करता था।

मुझे हमेशा ही अखबारों का बेहद शौक रहा है और यदि कोई राजनीतिक खबर विशेष हो तो अखबार मांग भी लेता था। होटल मुगल मे तो फ़ाईनेंशियल कंट्रोलर विनीत सक्सेना साहब ने कई अखबार मुझे घर लाने हेतु दिलवाने प्रारम्भ कर दिये थे जो उनके कंपनी छोडने के बाद भी बहौत दिनों तक मिलते रहे थे। दुकान पर सेठ जी से भी मै 'पंजाब केसरी' मांग लिया करता था और अक्सर एक लेख की चाह पर भी वह पूरा अखबार ही सौंप देते थे। डोडा डसकर साहब एक श्रंखला-'रूसियों का साम्यवाद से जी भर गया' लेखों की चला रहे थे। वैसे काफी अखबार मै ला चुका था जो घर पर सम्हाल कर रखे हुये थे। उन्ही मे से एक मे कहीं पंजाब की स्थानीय खबरों मे एक अजीब समाचार छपा था उसकी कटिंग काट कर शालिनी चुप-चाप सुबह ले आई होंगी।

उस बार शाम को जब मै आया और मेरी वजह से शालिनी और संगीता भी आँगन मे आ गए तो थोड़ी देर बाद शालिनी ने वह कटिंग निकाली  और बोली कि उस दिन भाभी जी ने आपको उस दिन की मजेदार खबर सुनाई थी आज आप यह पुरानी खबर उन्हे सुना दे उन्हे खूब मजा आयेगा। पहले मैंने कहा कि उस कटिंग को भाभी जी को दे दो वही खुद पढ़ लेंगी। परंतु शालिनी को तो अपनी उस भाभी से बदला निकालना था जिसका वह हमेशा ही बचाव करती थीं। वह अड़ गई कि भाभी जी को जो मजा सुनने मे आयेगा वह पढ़ने मे नहीं आयेगा। फिर मैंने सुझाव दिया कि सुनने मे नहीं तो सुनाने मे तो भाभी जी को मजा आता ही है ,अतः उन्हे सुनाने को दे दो ,अंततः शालिनी ने वह कटिंग संगीता को पकड़ा दी । उसमे एक नव-विवाहिता द्वारा सुहाग रात के बाद उसी रात खेतों मे एक बच्चे को जन्म देने की खबर थी जिसे बाद मे उसके पति ने तक्रार के बाद स्वीकार कर लिया था। इस खबर को खूब हँसते हुये संगीता पढ़ रही थीं और उनके पेट मे खूब बल पड़ रहे थे। हंसने और हंसी से पेट फूलने का नतीजा यह हुआ कि,संगीता के सभी वस्त्रों के हुक खुल कर ऊपरी वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गए और पेट के तनाव के कारण उन्हे नारा भी खोलना पड़ा । जान-बूझ कर या लापरवाही के कारण संगीता द्वारा एक हाथ से नारा खोलने पर दूसरे हाथ से चुन्नटें खुल कर बिखर गई। चुन्नटों को सम्हालने के चक्कर मे दूसरे हाथ से नारा भी फिसल गया और फिर नीचे निर्वस्त्र,ऊपर तो कहने को वस्त्र फिर भी बांहों पर  टंगे ही थे । एक बार तो संगीता सन्नाटे मे आ गई परंतु तुरंत सम्हल कर मुस्कराते हुये सब वस्त्र फिर ढंग से कर लिए। इसके  बाद संगीता बेहद प्रसन्न नजर आती रहीं। चाय के बाद हम लोग घर आ गए ।

घर पर इतमीनान से बैठने पर मैंने उस घटनाक्रम का कारण पूछा तो शालिनी का जवाब था कि जब संगीता (उन्होने भाभी जी शब्द नही बोला ) जरूरत से ज्यादा बेशर्म हैं आपको उस दिन वह खबर सुना रही थीं तो मैंने उन्हे आप से सुनवाना चाहा था। लेकिन यह भी ठीक रहा कि आपने उन्हे ही सुनाने को कहा और उनकी पूरी फिल्म सामने आ गई। चार या पाँच दिन बाद फिर शालिनी वहाँ गई और शाम को लौटते समय जब मै बुलाने गया तो उन्होने संगीता से पूछा कि उस दिन आपको बुरा तो नहीं लगा था क्योंकि आपको शर्मिंदगी उठानी पड़ गई। संगीता का जवाब फिर हैरत-अंगेज़ ही था कि किस बात  की शर्मिंदगी? आपने जो मज़ाक किया था वह बुरा मानने की बात क्या है? इस पर शालिनी ने संगीता से फिर कहा कि दिन मे आपने जो बात मुझसे कही थी तो वह भी बता दीजिये। काफी प्रसन्नतापूर्वक संगीता ने उस बात को दोहराते हुये बताया कि उन्होने कहा था कि आपने खुद देखा था विजय बाबू कुछ भी नहीं बोले इस जगह योगेन्द्र बाबू होते तो वह तो चिपट जाते। इस संभावना का कारण भी संगीता ने स्पष्ट किया कि एक बार जब वह योगेन्द्र को टी वी खरीदवाने उनके साथ रिक्शा पर साथ गई थी तो जाते-आते योगेन्द्र उनके (संगीता के) कूल्हो को थपथपाते मजा लेते गए थे। शालिनी ने बीच मे टोंक कर कहा कि आपको भी तो मजा आता रहा था,इस पर संगीता हंस दी।

जब घर पर मैंने शालिनी से पूछा कि अब क्या वह अपनी भाभी के खिलाफ हो गई हैं जो उनको बेनकाब करती जा रही है। शालिनी का उत्तर था वह बेहद गलत हैं इसका उतना अंदाजा शुरू मे किसी को नहीं था उनही के कारण मम्मी को यहा ज्यादा रुकना पड़ता है,15 दिन को गई तो मुझको  जल्दी-जल्दी चक्कर लगते रहने को कह गई है। लाईन मेन चारपाई बुनने आया था उसके पैंट की चेन खराब होगी मम्मी के सामने ही मुस्करा-मुस्करा कर वह कहती रहीं कि संतोष की चेन  खुली हुई है। उन्हे मर्दो से ही बात-चीत करने मे आनंद आता है इसी लिए आपके सामने भी खुलासा किया वैसे भी आपको बहौत कुछ पता था ही।

इसी पखवाड़े मे एक बार और शालिनी का वहाँ का ट्रिप लगा धूप और गर्मी से बचने हेतु वह घर से जल्दी चली थी लेकिन दुकान 11 बजे से पहले नही खुलती थी अतः मुझे सुबह भी एक घंटा रुकना ही पड़ा। चाय के बाद जब बच्चे टी वी पर जम गए और आँगन मे धूप थी अतः यह कहकर कि आपको टी वी से डिसटरबेन्स होता है संगीता हम लोगो को बारामदे मे ले आई। थोड़ी देर बाद संगीता इशारे से  कहती है कि उनके यहाँ (एक स्तन पर हाथ रख कर) सूजन हो गई है कोई दवा हो तो बता दीजिये और शाम को लौटते मे लेते आयेगा। शालिनी ने कहा कि पिछली बार निपिल कटे होने पर आपने बिना देखे दवा (SULPHOR 30) ला दी उससे फायदा भी हो गया लेकिन यह तरीका  गलत और रिसकी है पहले आपको देखना चाहिए तभी दवा का फैसला करना चाहिए। वस्तुतः वह निपिलों का कटना खुश्की के कारण था और उसमे सल्फर ही अचूक दवा होती है इसलिए ला दी थी।  उन्होने संगीता को दिखाने का इशारा किया वह तो जैसे उधार खा कर बैठी इसी बात का इंतजार कर रही थी । पलक झपकते ही दोनों खोल कर रख दिये। मै तो देखते ही समझ गया था कि यह चींटी के काटने की सूजन है किन्तु शालिनी ने मेरा हाथ पकड़ कर सूजे स्थान पर रख कर कहा दबा कर देखिये दर्द है या नहीं। दबाने पर दर्द होना लाजिमी ही था। फिर दूसरे पर उन्होने ही हाथ रख कर कहा और इसमे ,उसमे दर्द का प्रश्न कहाँ था बल्कि पहले वाला दर्द भी दूर हो गया और संगीता हंस दी। शाम को लौटते मे मै NATRUM MUR 6 X(किसी भी जहरीले कीड़े के काटने पर इस बायोकेमिक दवा से अचूक लाभ होता है) लेता आया और चार-चार गोलिया दिन मे तीन बार या 10-10-10 मिनट पीछे खाने को कहा। एक गोली पीस कर उसी चूर्ण को सूजन वाले स्थान पर लगाने को कहा। शालिनी ने तपाक से कहा कि सूजन पर एक बार लगा कर समझाते जाइए कैसे लगाना है। हा बता जाइए कह कर संगीता ने भी उसी तपाक से दोनों खोल डाले। जब मै चिकित्सक के नाते संगीता के पैर पर पट्टी बांध सकता था तो उसी चिकित्सक के नाते दवा की एक गोली अंगूठे से दबा कर पीस ली और सूजन वाले भाग तथा उसके इधर-उधर मल दी। शालिनी बोली सूजन के कारण संगीता (मुंह पर भी भाभी न कह कर)को दर्द हो गया जरा दूसरे को सहला दे जिससे आराम मिल जाये और अपने हाथ से मेरा हाथ दूसरी ओर रख दिया,आदतन संगीता को राहत मिलनी ही थी। घर आकर शालिनी ने कहा कि अब संगीता को ऐसे ही मजा चखाना पड़ेगा बहौत उछलती हैं। ......यह समय जहां राजनीतिक हलचलों का था वहीं इस प्रकार की बेवकूफी भरी हलचलों का भी। 

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3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दरता से विस्तारित रूप से व्याख्या किया है आपने! बढ़िया लगा!
    मेरे नये पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/
    http://seawave-babli.blogspot.com/

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  2. गुरूजी प्रणाम - यह भी जीवन की एक कला है ! समय पर बदलाव होने ही
    चाहिए !

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