शनिवार, 3 दिसंबर 2011

आगरा/1992 -93 (भाग-1)


सेठ जी के मित्र और 'शू चैंबर' के प्रेसीडेंट शंकर लाल मुरजानी साहब अक्सर उनकी दुकान मे आकर सो जाते थे। वह रश्मि एन्क्लेव,कमला नगर मे रहते थे। एक दिन मुझ से बोले माथुर साहब क्या बात है बेहद कमजोर हो गए हो। मैंने कहा साहब जीवन  चलाने हेतु कमजोर होना जरूरी है,तो फिर वह बोले और कमजोर कर दें?मैंने कहा यदि आप उचित समझते हैं तो कर दें। उन्होने कहा कल सुबह मुझे घर पर मिलो। जब अगले दिन मै उनके घर गया तो उन्होने कहा तुम्हारा सेठ बड़ा मतलबी है जब फँसता है मेरे पास आता है,मैंने उससे कहा था कि,माथुर साहब को पूछो मेरे यहाँ पार्ट-टाईम करेंगे? एक साल हो गया कहता है पूछने का टाईम नहीं मिला। इसलिए मैंने तुमसे सीधे बात की। मेरे घर पर आकर डेढ़ घंटा गर्मियों मे 7-30 से 9 और जाड़ों मे 9 से 10-30 सुबह सेल्स टैक्स-इन्कम टैक्स का काम कर देना शुरू मे रु 600/- दूंगा। घर के नजदीक होने तथा उनके व्यापारी नेता होने के कारण उनसे व्यवहार रखना घाटे का सौदा नहीं था,मैंने स्वीकार कर लिया। वह 'शू फेक्टर्स फ़ेडेरेशन ' के वाईस प्रेसिडेंट थे और राज कुमार सामा जी प्रेसिडेंट जो भाजपा के बड़े नेता थे। हालांकि वह जानते थे कि मै भाकपा मे सक्रिय हूँ फिर भी उन्हे स्पष्ट कर दिया। वह बोले हमारा -तुम्हारा संपर्क सिर्फ जाब तक है हम अपनी राजनीति मे तुम्हें नहीं शामिल करेंगे और न तुम्हारी राजनीति मे दखल देंगे।

पता नहीं क्यों सेठ जी उनके घर मेरे काम स्वीकारने से खुश नहीं थे?वह खिचे-खिचे रहने लगे। मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता था लेकिन मै और सतर्क हो गया। इससे पूर्व वह खुद मुझे तीन अलग-अलग पार्ट-टाईम जाब दिला चुके थे परंतु उन्हें अपने मित्र के यहाँ मेरा जाब करना अखर गया था। मैंने अपने भाकपा ,जिला मंत्री मिश्रा जी से भी चर्चा की थी। उन्होने बताया कि ये जूता व्यापारी भाजपा के होते हुये भी कम्यूनिस्ट पार्टी से दबते हैं क्योंकि तमाम लोग 'सोवियत यूनियन' को जूता सप्लाई करते हैं। रूस से पेमेंट मिलना निश्चित रहता है। कभी कोई दिक्कत होती है तो पार्टी के बड़े नेताओं से संपर्क साधते हैं। इसी लिए आपका कम्यूनिस्ट होना उन्हे नागवार नहीं लगता है,और वह सेठ भी आपको अपनी तरफ से हटाने की पहल नहीं करेगा।

जब रमेशकान्त लवानिया मेयर थे तब मिश्रा जी ने अपने घर के आस-पास सीवर की समस्या को उनके दफ्तर मे जाकर बताया तो उन्होने कहा था -अरे मिश्रा जी आपने आने की तकलीफ बेकार की फोन कर देते तब भी काम हो जाता। जो काम भाजपा का क्षेत्रीय पार्षद न करा सका वह भाकपा के जिलामंत्री की पहल पर चुटकियों मे हो गया। इस उदाहरण से मिश्रा जी ने मुझे समझाया था कि ये व्यापारी बड़े डरपोक होते हैं जब तक उनकी नब्ज आपकी पकड़ मे है वे आपको हटा नहीं सकते।

राजनीति और आजीविका के क्षेत्र मे सभी कुछ बदस्तूर चलता रहा। सिर्फ घरेलू क्षेत्र मे शालिनी का अपनी भाभी संगीता के प्रति बदला हुआ व्यवहार आश्चर्यजनक रहा। इस वर्ष की गर्मियों मे भी उनकी माँ जब 7-8 रोज के लिए बाहर गई तो शालिनी जल्दी-जल्दी सिटी के क्वार्टर पर जाती थीं। चूंकि तब तक स्कूल बंद नहीं हुये थे और उनकी माँ जल्दी गई थीं। यशवन्त को स्कूल छोडते हये मै शंकर लाल जी के घर चला जाता था। उनके घर से लौटने पर शालिनी साईकिल पर मेरे साथ सिटी क्वार्टर की परिक्रमा करके उसकी छुट्टी से पहले लौट आती थीं। वहाँ दिन भर रुकने की बजाए दो ढाई घंटे मे लौट लेना होता था। मै सेठ जी के यहाँ 6 घंटों की बजाए सिर्फ 3 घंटे काम तब कर पाता था ,खैर वह कहते कुछ नहीं थे। इसी क्रम मे एक बार शालिनी ने संगीता को कुछ इशारा किया और उन्होने मुस्करा कर जवाब दिया हाँ वायदा याद है आप बताइये किस गाने पर डांस करना है। शालिनी ने उन्हें कान मे कुछ कहा और उन्होने कहा ठीक है मौन डांस ही करेंगे गाएँगे नहीं। मै नहीं कह सकता कि कोई गाना भी था या नहीं। डांस मेरे समझ से परे था। मै तो सिर्फ इतना ही समझ सका कि डांस के नाम पर वह शरीर को मटकाना भर था। ऐसी हरकत ने केवल संगीता के शरीर मे उत्तेजना ही व्याप्त की और पूर्व की भांति जब स्वतः वस्त्र न खुले तो संगीता ने भाव-प्रदर्शन के सहारे उन्हे खोला ,नारा ढीला करने के नाम पर नीचे के वस्त्र हटाने से साफ हो गया कि बार-बार एक ही प्रक्रिया का दोहराया जाना किसी खास मकसद की छोटी कड़ी है। डी एस पी इंटेलीजेंस (जो मुगल होटल मे सेक्यूरिटी आफ़ीसर थे जब मैंने 1975 मे ज्वाईन किया था) के साथ बैठकें-चर्चाए व्यर्थ नहीं थीं उनसे कुछ न कुछ सीखा ही था। अच्छी या बुरी किसी प्रकार की प्रतिक्रिया मैंने कभी भी न दी। मैंने घर पर शालिनी से पूछना भी बंद कर दिया कि ऐसा करने का कारण क्या?

1990-91  मे आडवाणी की रथ-यात्रा और रामजन्म भूमि आंदोलन  द्वारा होने वाले अनिष्ट से जनता को आगाह करने हेतु यू पी मे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी ने तब की सातों कमिशनरियों के मुख्यालयों पर 'सांप्रदायिकता विरोधी रैली ' के आयोजन का फैसला किया था ।  मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सभी जिलों मे रैली करने का प्रस्ताव किया ,उसी क्रम मे मथुरा मे भी एक रैली हुई थी। मै अपने भाकपा साथियों के साथ ट्रेन से मथुरा गया था। शालिनी का कहना था कि उनकी छोटी बहन सीमा के घर भी हाल-चाल लेता आऊ;  क्योंकि योगेन्द्र चंद्र का क्वार्टर मथुरा जंक्शन पर ही था मैंने साथियों से सीधे रैली स्थल पर मिलने का वादा करके प्लेटफार्म से ही क्वार्टर का रास्ता पकड़ा। तभी थोड़ी देर पहले योगेन्द्र दिल्ली की गाड़ी पकड़ने हेतु गए होंगे और सीमा ने समझा था कि उनकी गाड़ी छूट गई होगी जिससे वह घर लौट आए होंगे । उन लोगों को मेरे पहुँचने की सूचना नहीं थी। सीमा ने दरवाजे खोले तो अस्त-व्यस्त और पुराने-फटे कपड़ों मे थी ,सफाई करते -करते बेल बजने पर यह सोच कर दरवाजा खोला था कि योगेन्द्र ही उल्टे -पैरों लौटे होंगे। उस दशा मे पहले कभी सीमा को नहीं देखा था। सीमा ने सोफ़े पर बैठाने के बाद अपनी बेटी (जो जब 6-7 वर्ष की रही होगी )से पानी भिजवा दिया और खुद कपड़े बदलने के बाद ही आई। यह अंतर था शरद मोहन और उनकी पत्नी संगीता के चरित्र और शरद की छोटी बहन सीमा के चरित्र का ,गफलत की बात और थी जो सीमा ने दरवाजा खोला था तब की दशा मे और फिर बैठ कर बात-चीत करते समय की दशा मे। मुझे ताज्जुब भी था कि आवारा माँ, भाइयों,भाभी का असर सीमा पर भी अपनी और  बहनों की ही तरह  बिलकुल नहीं पड़ा था।बेटियाँ  अपनी माँ के चरित्र से प्रभावित नहीं थीं जबकि बेटे माँ के चरित्र से प्रभावित थे। कमलेश बाबू के जिगरी दोस्त और भतीज दामाद कुक्कू(जिनकी बेटी की नन्द कमलेश बाबू की छोटी बेटी की देवरानी है) तो अश्लील पुस्तकें ला कर बिस्तर के नीचे छिपा कर रखते थे ताकि उनकी बहनें भी पढे और प्रभावित हों परंतु उनकी बहनें अपने आवारा भाई से प्रभावित नहीं हुई। यह एक अच्छी बात रही।

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2 टिप्‍पणियां:

  1. guruji प्रणाम -यह भी जीवन के एक कोण को दर्शाया ! जीवन में कैसे - कैसे लोग मिलते है !सार्थक और सही जीवन जीने की कला सभी को नहीं आती ! कुछ अपने को बर्बाद कर देते है !

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