रविवार, 18 मार्च 2012

आगरा/1992-93/भाग-10

क्रमशः .....

बताने के बावजूद और इस बात के मालूम चलने के बाद भी कि भाई -दोज़ के दिन वहीं का खाना खाकर शालिनी बीमार हुई थीं वहाँ से किसी ने भी देखने आने की जरूरत महसूस नहीं की,जबकि मै शालिनी ही की वजह से उन लोगों का हाल-चाल लेने जाता और मदद करता था वर्ना उन लोगों का व्यवहार ऐसा न था कि उन पर तरस खाया जा सके। सभी दुकानों पर थोड़ा- थोड़ा काम निबटा कर जल्दी घर पहुँच जाता था और भाकपा कार्यालय जाना स्थगित कर रखा था। सुबह मै मदद कर देता था शाम को बाबूजी की मदद से बउआ खाना बना लेती थीं।



उपरोक्त पोस्ट कार्ड कामरेड डॉ  जितेंद्र रघुवंशी(विदेशी भाषा विभाग के अध्यक्ष और रूसी भाषा के विद्वान,आगरा विश्वविद्यालय ,आगरा IPTA के राष्ट्रीय महामंत्री हैं ) द्वारा मुझे मीटिंग मे शामिल होने हेतु भेजने का कारण ही यह था कि मै घरेलू कारणो से जिला मंत्री को सहयोग कर पाने मे असमर्थ था। 'डंकल'प्रस्ताव देश की कृषि और अर्थ व्यवस्था को चौपट करने वाले थे उनके विरोध मे व्यापक जन-संघर्ष छेड़ना था। मै घरेलू संघर्ष मे उलझा हुआ था फिर भी 03 दिसंबर 1993 की बैठक मे शामिल हुआ। बीच मे जब डॉ रामनाथ का इलाज चल रहा था और उन्होने शालिनी को ग्लूकोज चढ़वाने का सुझाव दिया था और बउआ ने कहा कि ग्लूकोज चढ़वाने की देखभाल करने मे वह असमर्थ हैं कारण कि वह खुद ही अस्वस्थ थीं। मैंने राजा-की -मंडी क्वार्टर जाकर शालिनी की माँ से  कहा कि वह ग्लूकोज चढ़वाने भर तक देख लें तो वहाँ ले आयें। शालिनी की माता ने स्पष्ट इंकार कर दिया कि वह कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेंगी। मै मौके-बे-मौके उन लोगों की मदद करता रहा था उसके बावजूद शालिनी की माँ (जिनके हाथ का खाना खा कर ही वह बीमार हुई थीं)का इंकार चुभने वाली बात थी। मौके की नजाकत को भाँपते हुये संगीता ने कहा कि वह अपनी नन्द की देख-भाल कर लेंगी मै वहाँ पहुंचा दू। यह सोच कर कि वैसे भी भार तो उनही पर पड़ना था और वह खुद कह रही हैं मैंने शालिनी को शाम को वहाँ यशवंत के साथ पहुंचा दिया था और अगले दिन सुबह नौ बजे डॉ रामनाथ को लेकर वहाँ ग्लूकोज के साथ गया था। रात ही रात मे शालिनी की माँ, ताऊ और भाई मे कोई साठ-गांठ हुई होगी जिसका भान संगीता तक को न था। शालिनी की माँ और ताऊ (शरद तो ड्यूटी पर थे)ने अपने घर शालिनी को ग्लूकोज चढ़वाने से मना कर दिया। उन जेठ-भौजाई का कथन था हमने शादी कर दी अब हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है अपने घर ले जाकर ग्लूकोज चढ़वाओ । संगीता ने बीच मे हस्तक्षेप करते हुये कहा कि उन्होने ज़िम्मेदारी ली थी और वह उसे पूरा करेंगी। उनकी सास ने घुड़कते हुये कहा तुमने अपने पति से पूछे बगैर ज़िम्मेदारी ली थी जिसे तुम पूरा नहीं कर सकतीं। मैंने जब यह कहा कि तब आप लोग हमसे मदद क्यों लेते थे तो शालिनी की माँ और ताऊ समवेत स्वर मे बोले कि तुम (अर्थात मै विजय ) मूर्ख था जो उनकी मदद करता था। शालिनी ने अपने कानों से और अपनी आँखों के सामने जब अपनी माँ और ताऊ के प्रेम-वचन सुन लिए तो अवाक रह गई और उनको भी ठेस लगी कि वह नाहक ही मुझे अपने पीहरियों की मदद के लिए भेजती थीं।

शालिनी और यशवन्त को रिक्शा पर बैठा कर मै मोपेड़ से डॉ रामनाथ को लेकर चल रहा था ,मोपेड़ स्टार्ट हो चुकी थी शालिनी की माँ ने संगीता के कान मे कुछ फुसफुसाया और संगीता ने डॉ रामनाथ को आवाज दी -डॉ साहब। पल भर बात सुनने को कह कर डॉ रामनाथ उन लोगों से बात करने चले गए मै इंतजार करता रहा ,पेट्रोल फूंकता रहा रिक्शा वाला आगे बढ़ गया था अतः मैंने पीछे लौट कर डॉ रामनाथ को जल्दी चलने को कहा परंतु रिक्शा दीख नही रहा था। हरी पर्वत की तरफ बढ्ने के बावजूद हम पीछे लौट कर सेंट जोन्स कालेज वाले रूट पर आए तब बहुत आगे रिक्शा जाता दिखाई दिया। शालिनी के पास रुपए भी न थे ,यशवन्त उन्हे सम्हाल भी न सकता था। घर आकर ग्लूकोज चढ़वाया और मैंने ड्यूटी की छुट्टी कर दी।

डॉ रामनाथ ने संगीता का नाम लेकर कहा कि वह कह रही थीं कि शालिनी को टी बी हो गई है। मैंने उनसे पूछा आपकी मेडिकल राय क्या है? उनका जवाब था उन लोगों की संतुष्टि के लिए चेक करा लो। मैंने कामरेड डॉ विनय आहूजा (जो मुझे कम्युनिस्ट आंदोलन मे शामिल करने वाले कामरेड हरीश आहूजा,एडवोकेट के पुत्र थे),टी बी स्पेशलिस्ट को दिखाया। कंपाउंडर को फीस के रु 30/- मै जमा करके अपने नंबर का इंजार कर रहा था। डॉ विनय की निगाह मुझ पर पड़ गई और उन्होने तुरंत शालिनी को बुलवा लिया और मुझ से पूछा कि कंपाउंडर को फीस तो नही दी। मै चुप रहा तो कंपाउंडर को बुला कर पूछा। पहले मुझे रु 30/- वापिस दिलाये फिर हाल पूछ कर चेक किया और एक एक्सरे तथा कुछ चेक अप कराने को कहा।



इन रिपोर्टों तथा एक्सरे मे भी टी बी की पुष्टि नहीं हुई। डॉ विनय ने कुछ रिमार्क अपने प्रिस्क्रिप्शन पर दिया था जिस कारण मुझ से एक्सरे और लेबॉरेटरी वालों ने निर्धारित से कम रकम ली। डॉ वाला कमीशन डॉ विनय को न देकर मुझसे रुपए कम लिए गए। डॉ विनय जब 1988 मे सरोजनी नायडू मेडिकल कालेज,आगरा मे हाउस जाब कर रहे थे और चिकित्सक नेता थे तब बउआ के इलाज मे भी मदद करते रहे थे। आर्थोपेडिक विभाग द्वारा प्रेसक्रिब्ड दवाएं देख कर अपने पास से सेंपिल की बाबूजी को दे जाते थे। 1992 मे जब ऋषिराज की शादी मे जाने से पहले अपने होटल के केस के सिलसिले मे कामरेड हरीश आहूजा साहब से मिलने उनके घर गए थे तो उनके बड़े पुत्र कामरेड विजय आहूजा,एडवोकेट ने डॉ विनय की पत्नी जो आई स्पेशलिस्ट हैं से यशवन्त को दिखवाकर दवाएं लिखवा दी थीं। आज तो डॉ विनय का ट्रांस यमुना कालोनी मे एक बड़ा टी बी नरसिंग  होम है तब रामबाग चौराहे पर उनका क्लीनिक था।

डॉ विनय ने थायराड का चेक अप कराने को कहा था जब टी बी न होने की पुष्टि हो चुकी थी। परंतु शालिनी उसके लिए तैयार न हुई। लंबी बीमारी मे भी शालिनी को देखने न  तो शरद मोहन न ही कोई दूसरा  उनके परिवार का  सदस्य देखने आया किन्तु उसी दौरान शरद मोहन अपनी मौसेरी बहन चंचला उर्फ मिक्की  (जिन्हे गोद मे उठा कर टूंडला मे नाचते थे )  को लेकर स्वामी बाग स्थित उनकी भाभी के भाई के घर गए थे और खाना खा कर आए थे । 

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1 टिप्पणी:

  1. गुरूजी -बहुत ही मार्मिक प्रस्तुति ! अपना खून ही धोखा देता है !

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